Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 115

117 Mantra
12/115
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सार ऋषिः Chhand- निचृदगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ ते॑ व॒त्सो मनो॑ यमत् पर॒माच्चि॑त् स॒धस्था॑त्। अग्ने॒ त्वाङ्का॑मया गि॒रा॥११५॥

आ। ते॒। व॒त्सः। मनः॑। य॒म॒त्। प॒र॒मात्। चि॒त्। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त्। अग्ने॑। त्वाङ्का॑म॒येति॒ त्वाम्ऽका॑मया। गि॒रा ॥११५ ॥

Mantra without Swara
आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात् । अग्ने त्वाङ्कामया गिरा ॥

आ। ते। वत्सः। मनः। यमत्। परमात्। चित्। सधस्थादिति सधऽस्थात्। अग्ने। त्वाङ्कामयेति त्वाम्ऽकामया। गिरा॥११५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( अग्ने ) अग्ने ! तेजस्विन् पुरुष ! ( वत्स: ) बछड़ा जिस प्रकार अपनी माता के साथ ( आ यमत् ) बांध दिया जाता है उसी प्रकार ( परमात् चित् सधस्थात् ) परम आश्रयस्थान से प्राप्त हुई ( त्वां कामया ) जिस वाणी से हम तेरे प्रति अधिक प्रेम प्रदर्शन करते हैं उस ( गिरा ) वेद वाणी से ही से वित्त को ( आ यमत् ) बांधा जाता है। तू उससे बद्ध होकर राष्ट्र की व्यवस्था कर ।
आत्मा के पक्ष में- (त्वां कामया= आत्मा- नं कामया ) अपने आत्मा को ही दर्शन करने की इच्छा वाली वाणी से (परमात् सधस्थात् चित् ) परम आश्रय परमेश्वर से प्राप्त ( गिरा ) ज्ञान वाणी द्वारा ( ते मनः आ यमत् ) तेरा मन बंध कर एकाग्र हो ॥ शत०७।३ । २ ।८ ॥
स्त्री पुरुष के प्रति- हे अग्ने ! तेजस्विन् पुरुष ! ( परमात् सधस्थात् ) परमस्थान, हृदय से उत्पन्न ( त्वांकामया गिरा ) तुझे चाहने वाली मेरी वाणी से तेरा ( मनः ) मन गौ के साथ बछड़े के समान ( आ यमत् ) सब तरफ से मेरे साथ बंधे ।
Subject
राजा के कर्त्तव्य । पक्षान्तर में विद्वान् और गृहपति के कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वत्सार ऋषिः । अग्निर्देवता । निचृद्गायत्री । षड्जः ॥