Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 102

117 Mantra
12/102
Devata- को देवता Rishi- हिरण्यगर्भ ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा मा॑ हिꣳसीज्जनि॒ता यः पृ॑थि॒व्या यो वा॒ दिव॑ꣳ स॒त्यध॑र्मा॒ व्यान॑ट्। यश्चा॒पश्च॒न्द्राः प्र॑थ॒मो ज॒जान॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥१०२॥

मा। मा॒। हि॒ꣳसी॒त्। ज॒नि॒ता। यः। पृ॒थि॒व्याः। यः। वा॒। दिव॑म्। स॒त्यध॒र्मेति॑ स॒त्यऽध॑र्मा। वि। आन॑ट्। यः। च॒। अ॒पः। च॒न्द्राः। प्र॒थ॒मः। ज॒जान॑। कस्मै॑। दे॒वाय॑। ह॒विषा॑। वि॒धे॒म॒ ॥१०२ ॥

Mantra without Swara
मा मा हिँसीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिवँ सत्यधर्मा व्यानट् । यश्चापश्चन्द्राः प्रथमो जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

मा। मा। हिꣳसीत्। जनिता। यः। पृथिव्याः। यः। वा। दिवम्। सत्यधर्मेति सत्यऽधर्मा। वि। आनट्। यः। च। अपः। चन्द्राः। प्रथमः। जजान। कस्मै। देवाय। हविषा। विधेम॥१०२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( यः ) जो परमेश्वर ( पृथिव्या: जनिता ) पृथिवी का उत्पादक है और ( यः वा ) जो ( सत्य धर्मा ) सत्य धर्मवाला, सत्य के बल से जगत् को धारण करनेवाला होकर ( दिवं ) द्योलोक, आकाश और सूर्य को ( वि आनड् ) विविध प्रकार से व्याप्त है । और ( यः )जो ( प्रथम ) सबसे प्रथम विद्यमान होकर ( आपः ) जल को ( चन्द्राः ) ज्योति वाले सूर्यादि लोकों को ( जजान ) उत्पन्न करता है ( कस्मै ) उस सुखमय उपास्य देव को हम ( हविषा ) भक्ति और स्तुति से ( विधेम ) अर्चना करें। वह मा मा हिंसीत् ) मुझे कभी नाश न करे ।
राजा के पक्ष में-- जो पृथिवी का ( जनिता ) पिता के समान पालक सत्य नियमों वाला होकर ( यः दिवं व्यानट् ) जो सब व्यवहारों को चलाता है ( चन्द्रा आपः ) जो सबसे श्रेष्ठ होकर सब आह्लादकारी ग्रास प्रजाओं को ( जजान ) प्रकट करता है । उसके कर्त्तारूप प्रजापति को हम ( हविषा ) अन्न आदि उत्तम उपादेय पदार्थों से सेवा करें । वह राजा ( मा मा हिंसीत् ) सुरु राष्ट्र की प्रजा का नाश न करे । शत० ७ । ३ । १ । २० ॥
Subject
परमेश्वर और पक्षान्तर में राजा का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
हिरण्यगर्भ ऋषिः । को देवता । निचृदार्षी त्रिष्टुप् । धैवतः ॥