Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 64

83 Mantra
11/64
Devata- मित्रो देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उ॒त्थाय॑ बृह॒ती भ॒वोदु॑ तिष्ठ ध्रु॒वा त्वम्। मित्रै॒तां त॑ऽउ॒खां परि॑ ददा॒म्यभि॑त्याऽए॒षा मा भे॑दि॥६४॥

उ॒त्थाय॑। बृ॒ह॒ती। भ॒व॒। उत्। ऊँ॒ इत्यूँ॑। ति॒ष्ठ॒। ध्रु॒वा। त्वम्। मित्र॑। ए॒ताम्। ते॒। उ॒खाम्। परि॑। द॒दा॒मि॒। अभि॑त्यै। ए॒षा। मा। भे॒दि॒ ॥६४ ॥

Mantra without Swara
उत्थाय बृहती भवोदु तिष्ठ धु्रवा त्वम् । मित्रैतान्त उखाम्परिददाम्यभित्त्याऽएषा मा भेदि ॥

उत्थाय। बृहती। भव। उत्। ऊँ इत्यूँ। तिष्ठ। ध्रुवा। त्वम्। मित्र। एताम्। ते। उखाम्। परि। ददामि। अभित्यै। एषा। मा। भेदि॥६४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे प्रजे ! तू ( उत्थाय ) उठकर, अभ्युदयशील होकर ( बृहती भव ) बहुत बड़ी हो । तू ( उत् तिष्ठ ) उदय को प्राप्त हो, उठ, ( ध्रुवा त्वम् ) तू ध्रुवा है, सदा स्थिर रहने वाली है । हे ( मित्र ) प्रजा के सुहृद्- रूप राजन् ! ( उखाम् ) नाना ऐश्वर्यों को प्रदान करने वाली इस प्रजा को हांडी के समान ( ते परि ) तेरे अधीन (अभित्यै ) कभी छिन्न भिन्न न होने देने के लिये ( ददामि ) प्रदान करता हूं। देखना ( एषा ) यह ( मा भेदि ) कभी टूट न जाय । इसी प्रकार हे स्त्री ! तू उठकर बड़े पुरुषार्थं वाली हो । उठ, तू स्थिर होकर खड़ी हो। हे मित्रवर ! इस ! उखां ) प्रजा को खनन या प्राप्त कराने वाली स्त्री को तुझे सौंपता हूँ तुझ से कभी अलग न होने के लिये प्रदान करता हूं। यह तुझ से भिन्न होकर न रहे ॥ शत० ६ । ५ । ४ । १३ ॥
Subject
पृथ्वी और पक्षान्तर में स्त्री का कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
उखा देवता । अनुष्टुप् । गांधारः ॥