Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 48

83 Mantra
11/48
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ओष॑धयः॒ प्रति॑गृभ्णीत॒ पुष्प॑वतीः सुपिप्प॒लाः। अ॒यं वो॒ गर्भ॑ऽऋ॒त्वियः॑ प्र॒त्नꣳ स॒धस्थ॒मास॑दत्॥४८॥

ओष॑धयः। प्रति॑। गृ॒भ्णी॒त॒। पुष्प॑वती॒रिति॒ पुष्प॑ऽवतीः। सु॒पि॒प्प॒ला इति॑ सुऽपिप्प॒लाः। अ॒यम्। वः॒। गर्भः॑। ऋ॒त्वियः॑। प्र॒त्नम्। स॒धस्थ॒मिति॑ स॒धऽस्थ॑म्। आ। अ॒स॒द॒त् ॥४८ ॥

Mantra without Swara
ओषधयः प्रति गृभ्णीत पुष्पवतीः सुपिप्पलाः । अयँवो गर्भऽऋत्वियः प्रत्नँ सधस्थमासदत् ॥

ओषधयः। प्रति। गृभ्णीत। पुष्पवतीरिति पुष्पऽवतीः। सुपिप्पला इति सुऽपिप्पलाः। अयम्। वः। गर्भः। ऋत्वियः। प्रत्नम्। सधस्थमिति सधऽस्थम्। आ। असदत्॥४८॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा०- ( ओषधयः ) ओषधियां जिस प्रकार ( पुष्पवतीः ) फूल वाली और ( सुपिप्पलाः ) उत्तम फलवाली होकर गर्भ ग्रहण करती हैं, उसी प्रकार हे ( ओषधयः ) वीर्य को धारण करने में समर्थ स्त्रियो ! आप सभी ( पुष्पवतीः ) रजस्वला एवं ( सुपिप्पला : ) उत्तम सफल होकर ( प्रतिगृभ्णीत ) प्रत्येक पृथक् २ गर्भ ग्रहण करो । ( व: ) तुम्हारा (अयं ) यह ( गर्भः ) ग्रहण किया हुआ गर्भ ( ऋत्वियः ) ऋतुकाल में प्राप्त होकर ( प्रत्नम् ) अपने प्रथम प्राप्त ( सधस्थम् ) स्थान पर ही (आसदत् ) स्थिर रहे । राजा के पक्ष में- हे ( ओषधयः ) वीर प्रजाजनो ! आप लोग (पुष्पवती: ) पुष्टिप्रद अन्न आदि से समृद्ध और ( सुपिप्पलाः) उत्तम रक्षा साधनों से युक्त होकर ( प्रतिगृभ्णीत ) प्रत्येक सुरक्षित रहो । ( अयं वः ) यह राजा तुम्हें ( गर्भः ) ग्रहण या वश करने में समर्थ है। वह (प्रत्नं ) पूर्व प्राप्त (सधस्थम् ) उच्च आश्रय को (आसदत् ) प्राप्त किये रहे, अपने पूर्व पद से न गिरे ॥ शत० ६ । ४ । ४ । १७ ॥
Subject
औषधियों और प्रजाओं का वर्णन।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजापतिः साध्या वा ऋषयः।अग्निर्देवता । भुरिगनुष्टुप् । गांधारः ॥