Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 7

34 Mantra
10/7
Devata- वरुणो देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- विराट् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒ध॒मादो॑ द्यु॒म्निनी॒राप॑ऽए॒ताऽअना॑धृष्टाऽअप॒स्यो वसा॑नाः। प॒स्त्यासु चक्रे॒ वरु॑णः स॒धस्थ॑मपा शिशु॑र्मा॒तृत॑मास्व॒न्तः॥७॥

स॒ध॒माद॒ इति॑ सध॒ऽमादः॑। द्यु॒म्निनीः॑। आपः॑। ए॒ताः। अना॑धृष्टाः। अ॒प॒स्यः᳕। वसा॑नाः। प॒स्त्या᳖सु। च॒क्रे॒। वरु॑णः। स॒धस्थ॒मिति॑ स॒धऽस्थ॑म्। अ॒पाम्। शिशुः॑। मा॒तृत॑मा॒स्विति॑ मा॒तृऽत॑मासु। अ॒न्तरित्य॒न्तः ॥७॥

Mantra without Swara
सधमादो द्युम्निनीरापऽएताऽअनाधृष्टाऽअपस्यो वसानाः । पस्त्यासु चक्रे वरुणः सधस्थमपाँ शिशुर्मातृतमास्वन्तः ॥

सधमाद इति सधऽमादः। द्युम्निनीः। आपः। एताः। अनाधृष्टाः। अपस्यः। वसानाः। पस्त्यासु। चक्रे। वरुणः। सधस्थमिति सधऽस्थम्। अपाम्। शिशुः। मातृतमास्विति मातृऽतमासु। अन्तरित्यन्तः॥७॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( एताः ) ये ( आपः ) आप्त प्रजाएं ( सधमादः ) समस्त, एक साथ ही आनन्द अनुभव करनेहारी और ( द्युम्निनीः ) धन ऐश्वर्य और बलवीर्य वाली हों। वे ( अपस्यः ) उत्तम कर्म करने में कुशल, ( अनाष्टष्टाः ) शत्रुओं से धर्षित और पीड़ित न होकर, एक ही राष्ट्र में ( वसानाः ) रहती हैं। उन ( पस्त्यासु ) गृह बनाकर रहनेवाली प्रजाओं में ( वरुणः उन द्वारा वरण करने योग्य सर्वोत्तम राजा ( अपां शिशुः ) जलों के भीतर व्यापक अग्नि के समान और ( मातृतमासु अन्तः) उत्तम माताओं के भीतर जिस प्रकार बालक निर्भय होकर रहता और पालन पोषण पाता है उसी प्रकार राजा उन ( मातृतमासु ) राजा को सर्वोत्तम रूप से माता के समान मान करनेहारी प्रजाओं के बीच ( शिशुः ) व्यापकरूप से रहकर उनमें ही ( सधस्थम् ) अपना आश्रय स्थान ( चक्रे ) बनाता है और उनके साथ ही रमता है । शत० ५ । ३ । ५।१९ ॥
Subject
राजोत्पादक प्रजाएं ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
आपो वरुणश्च देवताः । विराडार्षी त्रिष्टुप् । धैवतः ॥