Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 1 / Mantra 16

31 Mantra
1/16
Devata- वायुः सविता देवता Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराट् ब्राह्मी त्रिष्टुप्,विराट् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कु॒क्कु॒टोऽसि॒ मधु॑जिह्व॒ऽइष॒मूर्ज॒माव॑द॒ त्वया॑ व॒यꣳ स॑ङ्घा॒तꣳ स॑ङ्घातं जेष्म व॒र्षवृ॑द्धमसि॒ प्रति॑ त्वा व॒र्षवृ॑द्धं वेत्तु॒ परा॑पूत॒ꣳ रक्षः॒ परा॑पूता॒ अरा॑त॒योऽप॑हत॒ꣳ रक्षो॑ वा॒युर्वो॒ विवि॑नक्तु दे॒वो वः॑ सवि॒ता हिर॑ण्यपाणिः॒ प्रति॑गृभ्णा॒त्वच्छि॑द्रेण पा॒णिना॑॥१६॥

कु॒क्कु॒टः। अ॒सि॒। मधु॑जिह्व॒ इति॒ मधु॑ऽजिह्वः। इष॑म्। ऊर्ज्ज॑म्। आ। वद॒। त्वया॑। व॒यं। सं॒घा॒तम् सं॑घात॒मि॑ति संघा॒तꣳसं॑घातम्। जे॒ष्म॒। व॒र्षवृद्ध॒मिति व॒र्षऽवृद्ध॑म्। अ॒सि॒। प्रति। त्वा॒। व॒र्षवृ॑द्ध॒मिति व॒र्षऽवृ॑द्धम्। वे॒त्तु॒। परा॑पूत॒मिति॒। परा॑ऽपूतम्। रक्षः॑। परा॑पूता॒ इति॒ परा॑ऽपूताः। अरा॑तयः। अप॑हत॒मित्यप॑ऽहतम्। रक्षः॑। वा॒युः। वः॒। वि। वि॒न॒क्तु दे॒वः। वः॒। स॒वि॒ता। हिर॑ण्यपाणि॒रिति॒ हिर॑ण्यऽपाणिः। प्रति॑। गृ॒भ्णा॒तु॒। अच्छिद्रेण। पा॒णिना॑ ॥१६॥

Mantra without Swara
कुक्कुटो सि मधुजिह्वऽइषमूर्जमावद त्वया वयँ सङ्धातँसङ्धातञ्जेष्म वर्षवृद्धमसि प्रति त्वा वर्षवृद्धं वेत्तु परापूतँ रक्षः परापूताऽअरातयो अपहतँ रक्षो वायुर्वो वि विनक्तु देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रति गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना ॥

कुक्कुटः। असि। मधुजिह्व इति मधुऽजिह्वः। इषम्। ऊर्ज्जम्। आ। वद। त्वया। वयं। संघातम् संघातमिति संघातꣳसंघातम्। जेष्म। वर्षवृद्धमिति वर्षऽवृद्धम्। असि। प्रति। त्वा। वर्षवृद्धमिति वर्षऽवृद्धम्। वेत्तु। परापूतमिति। पराऽपूतम्। रक्षः। परापूता इति पराऽपूताः। अरातयः। अपहतमित्यपऽहतम्। रक्षः। वायुः। वः। वि। विनक्तु देवः। वः। सविता। हिरण्यपाणिरिति हिरण्यऽपाणिः। प्रति। गृभ्णातु। अच्छिद्रेण। पाणिना॥१६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
 हे वीर राजन् ! तू ( कुक्कुटः ) चोर डाकुओं को नाश करने वाला और (मधुजिह्नः ) मधुर जिह्वावाला अर्थात् मधुर वाणी  बोलने हारा ( असि ) है । तू हमें ( इयम्) अन्न आदि भोग्य पदार्थ या प्रेरक आज्ञा वचन ( ऊर्जम् ) परम विद्यादि पराक्रम तथा अन्यान्य बलकारी पदार्थों को प्राप्त करने का ( आ वद ) उपदेश कर । लोगों को अन्नादि उत्पन्न करने की आज्ञा दे । ( त्वया ) तुझ वीर अग्रणी राजा के द्वारा ( वयम् ) हम ( संघातं संघातम् ) शत्रुओं को मार मार कर ( जेष्म) विजय करें । ( वर्षवृद्धम् असि ) जिस प्रकार सूप की सीकें वर्षा से बढ़ी होने के कारण वह सूप वर्षवृद्ध हैं उसी प्रकार हे ज्ञानी पुरुष तू भी वर्षों में अधिक आयु होने से वर्षवृद्ध है । ( वर्षवृद्धं त्वा) तुझ  उस वर्षों में बूढ़े, दीर्घायु एवं वृद्ध अनुभवी तुझ  पुरुष को( प्रतिवेन्तु)प्रत्येक  पुरुष जाने । जिस प्रकार सूप अन्न को फटक कर भूसी को  पृथक् कर देता है उसी प्रकार हे ज्ञानवृद्धऔर वयोवृद्ध पुरुष तेरे विवेक और युक्ति द्वारा ( रक्षः ) प्रजा में विघ्नकारी दुष्ट पुरुष ( पराभूतम् ) दूर हो, और ( अरातयः ) शत्रुगण भी ( परापूताः ) पछोड़ २ कर दूर कर दिये जाय । इस प्रकार ( रक्षः ) विघ्नकारी दुष्ट पुरुष जब (अप- हतम् ) ताड़ित हो तब (वायुः) वायु जिस प्रकार छाज से गिराये अन्न में से भूसी को दूर उड़ा देता है और अन्न पृथक् हो जाता है उसी प्रकार हे प्रजागण !  आप्त पुरुषो ! ( वः ) तुम्हारे बीच में ( वायुः ) व्यापक, ज्ञानी पुरुष ही ( वि विनक्तु ) धर्म अधर्म का, बुरे भले का विवेक करे। जिस प्रकार पुनः सुवर्णादि से धनाढ्य पुरुष द्रव्य देकर अन्न को हाथों से भर कर उठा लेता है उसी प्रकार ( हिरण्यपाणिः ) सुवर्ण- कंकण को हाथ में धारण करने हारा (वः सविता देवः) तुम्हारा प्रेरक, सूर्य के समान उज्ज्वल, प्रतापी राजा ( वः ) तुम सब प्रजाजनों को ( अच्छिद्रेण पाणिना )  छिद्र रहित हाथों से, त्रुटिरहित साधन से ( प्रतिगृभ्णातु ) स्वीकार करे, रक्षा करे || शत० १ । १ । ४। १८-२४॥ 
 
Subject
दुष्टों का न्याय विभाग द्वारा अपराधविवेचन, दमन ।
Footenote
टिप्पणी   १६ - 'संघाते संघाते', '0प्रतिपूता अरातय०`। ० प्रतिगृह्णातु हिरण्य पाणिरच्छिद्रेण 'पाणि' इति काण्व ० ॥
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वाक् शूर्प हवी रक्षः तण्डुलाश्च वायुः सविता च देवताः ( १ ) ब्राह्मी त्रिष्टुप्, धैवतः, ( २ ) विराड् गायत्री । षड्जः ॥