Yajurveda Bhashyam (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 15

77 Mantra
18/15
Devata- धनादियुक्ता आत्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- विराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वसु॑ चे मे वस॒तिश्च॑ मे॒ कर्म॑ च मे॒ शक्ति॑श्च॒ मेऽर्थ॑श्च म॒ऽएम॑श्च मऽइ॒त्या च॑ मे॒ गति॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥१५॥

वसु॑। च॒। मे॒। व॒स॒तिः। च॒। मे॒। कर्म॑। च॒। मे॒। शक्तिः॑। च॒। मे॒। अर्थः॑। च॒। मे॒। एमः॑। च॒। मे॒। इ॒त्या। च॒। मे॒। गतिः॑। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥१५ ॥

Mantra without Swara
वसु च मे वसतिश्च मे कर्म च मे शक्तिश्च मे र्थश्च मऽएमश्च मऽइत्या च मे गतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

वसु। च। मे। वसतिः। च। मे। कर्म। च। मे। शक्तिः। च। मे। अर्थः। च। मे। एमः। च। मे। इत्या। च। मे। गतिः। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Swami Dayanand Saraswati)

संस्कृत
Yajurveda Bhashyam (Swami Dayanand Saraswati) - संस्कृत
Meaning
(वसु) वस्तु (च) प्रियम् (मे) (वसतिः) यत्र वसन्ति सा (च) सामन्ता (मे) (कर्म) अभीप्सिततमा क्रिया (च) कर्त्ता (मे) (शक्तिः) सामर्थ्यम् (च) प्रेम (मे) (अर्थः) सकलपदार्थसञ्चयः (च) सञ्चेता (मे) (एमः) एति येन स प्रयत्नः (च) बोधः (मे) (इत्या) एमि जानामि यया रीत्या सा (च) युक्तिः (मे) (गतिः) गमनम् (च) उत्क्षेपणादि कर्म (मे) (यज्ञेन) पुरुषार्थानुष्ठानेन (कल्पन्ताम्)॥१५॥
Essence
हे मनुष्याः! ये जनाः सर्वं सामर्थ्यादिकं सर्वहितायैव कुर्वन्ति, त एव प्रशंसिता भवन्ति॥१५॥
Subject
पुनस्तमेव विषयमाह॥
Anvaya
मे वसु च मे वसतिश्च मे कर्म च मे शक्तिश्च मेऽर्थश्च म एमश्च म इत्या च मे गतिश्च यज्ञेन कल्पन्ताम्॥१५॥