Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 37

40 Mantra
9/37
Devata- अग्निर्देवता Rishi- देवावत ऋषिः Chhand- निचृत् अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अग्ने॒ सह॑स्व॒ पृ॑तनाऽअ॒भिमा॑ती॒रपा॑स्य। दु॒ष्टर॒स्तर॒न्नरा॑ती॒र्वर्चो॑ धा य॒ज्ञवा॑हसि॥३७॥

अग्ने॑। सह॑स्व। पृत॑नाः। अ॒भिमा॑ती॒रित्य॒भिऽमा॑तीः। अप॑। अ॒स्य॒। दु॒ष्टरः॑। दु॒ष्तर॒ इति॑ दुः॒ऽतरः॑। तर॒न्। अरा॑तीः। वर्चः॑। धाः॒। य॒ज्ञवा॑ह॒सीति॑ य॒ज्ञऽवा॑हसि ॥३७॥

Mantra without Swara
अग्ने सहस्व पृतनाऽअभिमातीरपास्य । दुस्टरस्तरन्नरातीर्वर्चाधा यज्ञवाहसि ॥

अग्ने। सहस्व। पृतनाः। अभिमातीरित्यभिऽमातीः। अप। अस्य। दुष्टरः। दुष्तर इति दुःऽतरः। तरन्। अरातीः। वर्चः। धाः। यज्ञवाहसीति यज्ञऽवाहसि॥३७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र में राजा के मुख्य कार्य का प्रतिपादन इन शब्दों में करते हैं कि १. ( अग्ने ) = हे राष्ट्र को सब दृष्टिकोणों से उन्नत करनेवाले राजन्! ( पृतनाः ) = [ पृङ् व्यायामे, तनु विस्तारे ] व्यायाम के द्वारा शक्तियों को विस्तृत करनेवाले लोगों को ही ( सहस्व ) = सहो, अर्थात् [ ‘षह् मर्षणे’ = show mercy ] उन्हीं पर आपकी दया हो, अर्थात् राष्ट्र में अकर्मण्य लोगों के लिए स्थान न हो। राष्ट्र में सभी व्यक्ति कार्यों में लगे हों। 

२. ( अभिमातीः ) = अभिमान से भरे लोगों को, अर्थात् अन्याय मार्गों से अर्जित धन के गर्व में सब कार्य नौकरों से करानेवाले, स्वयं अभिमान के मद में चूर होने के कारण आराम का जीवन बितानेवाले लोगों को ( अपास्य ) = राष्ट्र से दूर [ अप ] अस्य = फेंक दे। अकर्मण्य धनियों का राष्ट्र में स्थान न हो। 

३. ( दुष्टरः ) = हे सब विघ्नों व बुराइयों को तैर जानेवाले राजन्! ( अरातीः ) = [ अ = न रातिः  = देना ] राष्ट्र के लिए उचित कर आदि न देनेवाले लोगों को— ( तरन् ) = [ subdue, de- stroy, become master of ] अभिभूत करते हुए, आप ४. ( यज्ञवाहसि ) = कर आदि को ठीक प्रकार से देने के द्वारा [ यज् = दान ] राष्ट्र-यज्ञ के चलाने में सहायक लोगों में ( वर्चः ) = तेजस्विता को ( धाः ) = स्थापित कर, अर्थात् राष्ट्र में शक्ति उन लोगों के हाथ में हो जो क्रियाशील हैं, अभिमानरहित हैं और सदा अपने देयभाग को देनेवाले हैं। ऐसा होने पर ही राष्ट्र की उन्नति होगी और राजा भी अपने ‘अग्नि’ नाम को सार्थक कर पाएगा।
Essence
भावार्थ — १. राष्ट्र में क्रियाशील लोगों को ही सहन किया जाए। २. अभिमान में चूर, अन्यायार्जित धन से धनी लोगों को राष्ट्र से निर्वासित कर दिया जाए [ अपास्य ] तथा ३. उचित कर आदि को न देनेवालों को अभिभूत किया जाए। ४. यज्ञशील लोगों की ही शक्ति को बढ़ाया जाए। धार्मिकों का ही राष्ट्र में प्रभुत्व हो, अधार्मिकों का नहीं।
Subject
अग्नि