Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 35

40 Mantra
9/35
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- विराट् उत्कृति Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए॒ष ते॑ निर्ऋते भा॒गस्तं जु॑षस्व॒ स्वाहा॒ऽग्निने॑त्रेभ्यो दे॒वेभ्यः॑ पुरः॒सद्भ्यः॒ स्वाहा॑ य॒मने॑त्रेभ्यो दे॒वेभ्यो॑ दक्षिणा॒सद्भ्यः॒ स्वाहा॑ वि॒श्वदे॑वनेत्रेभ्यो दे॒वेभ्यः॑ पश्चा॒त्सद्भ्यः॒ स्वाहा॑ मि॒त्रावरु॑णनेत्रेभ्यो वा म॒रुन्ने॑त्रेभ्यो वा दे॒वेभ्य॑ऽउत्तरा॒सद्भ्यः॒ स्वाहा॒ सोम॑नेत्रेभ्यो दे॒वेभ्य॑ऽउपरि॒सद्भ्यो॒ दुव॑स्वद्भ्यः॒ स्वाहा॑॥३५॥

ए॒षः। ते॑ नि॒र्ऋ॒त इति॑ निःऽऋते। भा॒गः। तम्। जु॒ष॒स्व॒। स्वाहा॑। अ॒ग्निने॑त्रेभ्य॒ इत्य॒ग्निऽने॑त्रेभ्यः। दे॒वेभ्यः॑। पु॒रः॒सद्भ्य॒ इति॑ पुरःसत्ऽभ्यः॑। स्वाहा॑। य॒मने॑त्रेभ्य॒ इति॑ य॒मऽने॑त्रेभ्यः। दे॒वेभ्यः॑। द॒क्षि॒णा॒सद्भ्य॒ इति॑ दक्षिणा॒सत्ऽभ्यः॑। स्वाहा॑। वि॒श्वदे॑वनेत्रेभ्य॒ इति॑ वि॒श्वदे॑वऽनेत्रेभ्यः। दे॒वेभ्यः॑। प॒श्चात्सद्भ्य॒ इति॑ पश्चा॒त्सत्ऽभ्यः॑। स्वाहा॑। मि॒त्रावरु॑णनेत्रेभ्य॒ इति॑ मि॒त्रावरु॑णऽनेत्रेभ्यः। वा॒। म॒रुन्ने॑त्रेभ्य॒ इति॑ म॒रुत्ऽने॑त्रेभ्यः। वा॒। दे॒वेभ्यः॑। उ॒त्त॒रा॒सद्भ्य॒ इत्यु॑त्तरा॒सत्ऽभ्यः॑। स्वाहा॑। सोम॑नेत्रेभ्य॒ इति॑ सोम॑ऽनेत्रेभ्यः। दे॒वेभ्यः॑। उ॒प॒रि॒सद्भ्य॒ इत्यु॑परि॒सत्ऽभ्यः॑। दुव॑स्वद्भ्य॒ इति॑ दुव॑स्वत्ऽभ्यः। स्वाहा॑ ॥३५॥

Mantra without Swara
एष ते निरृते भागस्तञ्जुषस्व स्वाहाग्निनेत्रेभ्यो देवेभ्यः पुरःसद्भ्यः स्वाहा यमनेत्रेभ्यो देवेभ्यो दक्षिणासद्भ्यः स्वाहा विश्वदेवनेत्रेभ्यो देवेभ्यो पश्चात्सद्भ्यः स्वाहा मित्रावरुणनेत्रेभ्यो वा मरुन्नेत्रेभ्यो वा देवेभ्य उत्तरासद्भ्यः स्वाहा सोमनेत्रेभ्यो देवेभ्य ऽउपरिसद्भ्यो दुवस्वद्भ्यः स्वाहा ॥

एषः। ते निर्ऋत इति निःऽऋते। भागः। तम्। जुषस्व। स्वाहा। अग्निनेत्रेभ्य इत्यग्निऽनेत्रेभ्यः। देवेभ्यः। पुरःसद्भ्य इति पुरःसत्ऽभ्यः। स्वाहा। यमनेत्रेभ्य इति यमऽनेत्रेभ्यः। देवेभ्यः। दक्षिणासद्भ्य इति दक्षिणासत्ऽभ्यः। स्वाहा। विश्वदेवनेत्रेभ्य इति विश्वदेवऽनेत्रेभ्यः। देवेभ्यः। पश्चात्सद्भ्य इति पश्चात्सत्ऽभ्यः। स्वाहा। मित्रावरुणनेत्रेभ्य इति मित्रावरुणऽनेत्रेभ्यः। वा। मरुन्नेत्रेभ्य इति मरुत्ऽनेत्रेभ्यः। वा। देवेभ्यः। उत्तरासद्भ्य इत्युत्तरासत्ऽभ्यः। स्वाहा। सोमनेत्रेभ्य इति सोमऽनेत्रेभ्यः। देवेभ्यः। उपरिसद्भ्य इत्युपरिसत्ऽभ्यः। दुवस्वद्भ्य इति दुवस्वत्ऽभ्यः। स्वाहा॥३५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. राष्ट्र में राजा व सभ्य चुने जाते हैं। चुने जाने के कारण इनका नाम ‘वरुण’ है [ व्रियन्ते ]। इनमें सर्वप्रथम राजा का उल्लेख करते हैं कि— हे ( निऋर्ते ) = [ ‘तिग्मतेजा वा निऋर्तिः’ श० ७।८।१।१० ] तीव्र तेजवाले राजन्! ( एषः ) = यह राष्ट्र, यह देश ( ते ) = तेरा ( भागः ) [ भज्यते सेव्यते कर्मणि घञ् ] = सेवनीय है, तूने इस देश की सेवा करनी है।( तं जुषस्व ) = तू उस देश की प्रीतिपूर्वक सेवा कर। पूर्ण उत्साह से राष्ट्र की सेवा में प्रवृत्त हो। ( स्वाहा ) = तू इस राष्ट्र की सेवा के लिए स्वार्थ का त्याग करनेवाला हो। 

२. इस राजा के पूर्वभाग में वे सभ्य बैठे हैं जो ( अग्निनेत्रेभ्यः ) = राष्ट्र को उन्नत करने के दृष्टिकोणवाले हैं, जिनका कार्य सदा राष्ट्र की उन्नति के विषय में सोचनामात्र है, जो सदा उन्नति की योजनाएँ [ plannings ] बनाते रहते हैं। इन ( पुरःसद्भ्यः ) = पूर्वभाग में बैठनेवालों ( देवेभ्यः ) = देदीप्यमान मस्तिष्कवालों के लिए ( स्वाहा ) = हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं। 

३. अब ( यमनेत्रेभ्यः ) = नियन्त्रण के दृष्टिकोणवाले—राष्ट्र में व्यवस्था स्थापित करनेवाले [ होम-मिनिस्ट्री के सदस्यों के लिए ] ( देवेभ्यः ) = अनियन्त्रण पर विजय पानेवाले विद्वानों के लिए ( दक्षिणा सद्भ्यः ) = राजा के दक्षिण पार्श्व में स्थित देवों के लिए ( स्वाहा ) = हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं। अग्निनेत्र देवों ने आगे और आगे ले-चलना है, अतः अग्रगति की प्रतीक ‘प्राची’ दिशा उनका स्थान है और नियन्त्रण के द्वारा कार्यकुशलता में वृद्धि करनेवाले देवों की दिशा ‘दक्षिण’ है—यही दिशा दाक्षिण्य व कुशलता का प्रतीक है। 

४. ( विश्वदेवनेत्रेभ्यः ) = सब दिव्य गुणों के विकास के दृष्टिकोणवाले ( पश्चात् सद्भ्यः ) = पश्चिम में स्थित होनेवाले, क्योंकि यही दिशा प्रत्याहार = [ फिर से वापस लाने ] की प्रतीक है ( देवेभ्यः ) = देवों के लिए ( स्वाहा ) = हम शुभ शब्द बोलते हैं। पश्चिम दिशा ‘प्रतीची’ कहलाती है। इसमें सूर्यकिरणें ‘प्रति अञ्च्’ वापस आती हैं। इसी प्रकार इसमें स्थित देवों का कार्य प्रजाओं को विषयों से व्यावृत्त करना है। विषयों से वापस लाकर ही तो ये उन्हें दिव्य गुणोंवाला बनाएँगे। इसी दृष्टिकोण से ये विश्वदेवनेत्र हैं—अर्थात् राष्ट्र में प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञानी बनाने के दृष्टिकोणवाले हैं। 

५. ( उत्तरासद्भ्यः ) = उन्नति की प्रतीकभूत उत्तर दिशा में बैठनेवाले ( मित्रावरुणनेत्रेभ्यः ) = प्राणापान की वृद्धि के दृष्टिकोणवाले अथवा स्नेहवर्धन व द्वेष-निवारण के दृष्टिकोणवाले ( देवेभ्यः ) = देवों के लिए अथवा ( मरुन्नेत्रेभ्यः ) = सब प्राण-भेदों के वर्धन के दृष्टिकोणवाले देवों के लिए ( स्वाहा ) = हम शुभ शब्द कहते हैं। प्राणों की शक्ति की वृद्धि ही सब उन्नतियों का मूल है। 

६. अन्त में ( सोमनेत्रेभ्यः ) = सौम्यता ही जिनका दृष्टिकोण है उन ( उपरिसद्भ्यः ) = जो राजा के भी ऊपर हैं [ जैसे रामचन्द्र के ऊपर वसिष्ठ थे ], जिनकी बात राजा भी आज्ञावत् मानता है, उन ( दुवस्वद्भ्यः ) = प्रभु परिचर्यारत ( देवेभ्यः ) = विद्वानों के लिए ( स्वाहा ) = हम प्रशंसा के शब्द बोलते हैं। इन्हीं के लिए ४० वें मन्त्र में इस प्रकार के शब्द कहे जाएँगे कि ‘एष वो अमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा’ अर्थात् ( अमी ) = हे प्रजाओ। ( वः ) = आपका ( एषः ) = यह ( राजा ) = राजा है, परन्तु ( अस्माकम् ) = हम [ ब्रह्मणि स्थितानाम् ] सदा ब्रह्म में स्थित होनेवालों का तो ( सोमः ) = परमात्मा ही ( राजा ) = राजा व शासक है। एवं, ये प्रभु परिचर्यारत ‘दुवस्वत्’ लोग ‘उपरिसद्’ हैं, राजा से भी ऊपर हैं।
Essence
भावार्थ — राजा राष्ट्र का सबसे बड़ा सेवक है। उसके मन्त्रीवर्ग क्रमशः राष्ट्र की उन्नति, नियन्त्रण, दिव्य गुणवृद्धि, ज्ञान का विस्तार व प्राणशक्ति की वृद्धि करने में लगे हैं। कुछ लोग वे भी हैं जिनका कार्य यह है कि इन सब अधिकारियों को सौम्य बनाये रहें।
Subject
राजा व मन्त्रीवर्ग