Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 34

40 Mantra
9/34
Devata- वस्वादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- तापस ऋषिः Chhand- निचृत् जगती,निचृत् धृति, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वस॑व॒स्त्रयो॑दशाक्षरेण त्रयोद॒शꣳ स्तोम॒मुद॑जयँ॒स्तमुज्जे॑षꣳ रु॒द्राश्चतु॑र्दशाक्षरेण चतुर्द॒शꣳ स्तोम॒मुद॑जयँ॒स्तमुज्जे॑षमादि॒त्याः पञ्च॑दशाक्षरेण पञ्चद॒शꣳ स्तोम॒मुद॑जयँ॒स्तामुज्जे॑ष॒मदि॑तिः॒ षोड॑शाक्षरेण षोड॒शꣳस्तोम॒मुद॑जय॒त् तमुज्जे॑षं प्र॒जाप॑तिः स॒प्तद॑शाक्षरेण सप्तद॒शꣳ स्तोम॒मुद॑जय॒त् तमुज्जे॑षम्॥३४॥

वस॑वः। त्रयो॑दशाक्षरे॒णेति॒ त्रयो॑दशऽअक्षरेण। त्र॒यो॒द॒शमिति॑ त्रयःऽद॒शम्। स्तोम॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒न्। तम्। उत्। जे॒ष॒म्। रु॒द्राः। चतु॑र्दशाक्षरे॒णेति॒ चतु॑र्दशऽअक्षरेण। च॒तु॒र्द॒शमिति॑ चतुःऽद॒शम्। स्तोम॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒न्। तम्। उत्। जे॒ष॒म्। आ॒दि॒त्याः। पञ्च॑दशाक्षरे॒णेति॒ पञ्च॑दशऽअक्षरेण। प॒ञ्च॒द॒शमिति॒ पञ्चऽद॒शम्। स्तोम॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒न्। तम्। उत्। जे॒ष॒म्। अदि॑तिः। षोड॑शाक्षरे॒णेति॒ षोड॑शऽअक्षरेण। षो॒ड॒शम्। स्तोम॑म्। उत्। अ॒ज॒यत्। तम्। उत्। जे॒ष॒म्। प्र॒जाप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। स॒प्त॑दशाक्षरे॒णेति स॒प्तद॑शऽअक्षरेण। स॒प्त॒द॒श॒मिति॑ सप्तऽद॒शम्। स्तोम॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। तम्। उत्। जे॒ष॒म् ॥३४॥

Mantra without Swara
वसवस्त्रयोदशाक्षरेण त्रयोदशँ स्तोममुदजयँस्तमुज्जेषँ रुद्राश्चतुर्दशाक्षरेण चतुर्दशँ स्तोममुदजयँस्तमुज्जेषमादित्याः पञ्चदशाक्षरेण पञ्चदशँ स्तोममुदजयँस्तमुज्जेषमदितिः षोडशाक्षरेण षोडशँ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषम्प्रजापतिः सप्तदशाक्षरेण सप्तदशँ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषम् ॥

वसवः। त्रयोदशाक्षरेणेति त्रयोदशऽअक्षरेण। त्रयोदशमिति त्रयःऽदशम्। स्तोमम्। उत्। अजयन्। तम्। उत्। जेषम्। रुद्राः। चतुर्दशाक्षरेणेति चतुर्दशऽअक्षरेण। चतुर्दशमिति चतुःऽदशम्। स्तोमम्। उत्। अजयन्। तम्। उत्। जेषम्। आदित्याः। पञ्चदशाक्षरेणेति पञ्चदशऽअक्षरेण। पञ्चदशमिति पञ्चऽदशम्। स्तोमम्। उत्। अजयन्। तम्। उत्। जेषम्। अदितिः। षोडशाक्षरेणेति षोडशऽअक्षरेण। षोडशम्। स्तोमम्। उत्। अजयत्। तम्। उत्। जेषम्। प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। सप्तदशाक्षरेणेति सप्तदशऽअक्षरेण। सप्तदशमिति सप्तऽदशम्। स्तोमम्। उत्। अजयत्। तम्। उत्। जेषम्॥३४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( वसवः ) = अपने निवास को उत्तम बनानेवाले वसु ब्रह्मचारी त्रयोदश ( अक्षरेण ) = तेरह अविनाशी व व्यापक तत्त्वों से ( त्रयोदशं स्तोमम् ) = तेरह के समूह को—अर्थात् इन्द्रियरूप नव द्वारों तथा मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार को ( उदजयत् ) = जीत लेते हैं। मैं भी ( तम् ) = नव द्वारों तथा अन्तःकरण चतुष्टय को ( उज्जेषम् ) = जीत लूँ। वस्तुतः उत्तम निवास के लिए इन सबका ठीक होना आवश्यक है। 

२. ( रुद्राः ) = [ रुत् + र ] ज्ञान देनेवाले रुद्र ब्रह्मचारी ( चतुर्दश अक्षरेण ) =  चौदह व्यापक शक्तियों के द्वारा ( चतुर्दशं स्तोमम् ) = चौदह के समूह को, दश इन्द्रियाँ [ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ ] तथा मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार को ( उदजयन् ) = जीत लेते हैं। ( तम् ) = उस समूह को ( उज्जेषम् ) = मैं भी जीत लूँ। 

३. ( आदित्याः ) = सब स्थानों से उत्तमताओं का ग्रहण करनेवाले आदित्य ब्रह्मचारी ( पञ्च दशाक्षरेण ) = पन्द्रह व्यापक शक्तियों के द्वारा ( पञ्चदशं स्तोमम् ) = दश इन्द्रियाँ—मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तथा हृदय के समूह को ( उदजयन् ) = जीत लेते हैं ( तम् ) = उस समूह को मैं भी ( उज्जेषम् ) = जीत लूँ। 

४. ( अदितिः ) = अदीना देवमाता ( षोडश अक्षरेण ) = सोलह व्यापक शक्तियों के द्वारा ( षोडशं स्तोमम् ) = सोलह के समूह को—शरीर में निवास करनेवाली सोलह कलाओं को ( उदजयत् ) = जीत लेती है ( तम् ) =  उस सोलह कलाओं के समूह को ( उज्जेषम् ) = मैं भी जीत लूँ। 

५. ( प्रजापतिः ) = प्रजाओं का रक्षक अथवा प्रजा—विकास की रक्षा करनेवाला राजा ( सप्तदशाक्षरेण ) = सत्रह व्यापक शक्तियों के द्वारा ( सप्तदशं स्तोमम् ) = दस इन्द्रियों, पञ्च प्राण तथा मन व बुद्धि के समूहरूप सूक्ष्म व लिङ्गशरीर को ( उदजयत् ) = जीत लेता है, ( तम् ) = मैं भी सत्रह तत्त्वों से बने सूक्ष्म शरीर को ( उज्जेषम् ) = जीत लूँ। इस शरीर की विजय के बाद ही तो मैं कारणशरीर के विजय के लिए उद्यत होऊँगा। अथवा १. वसु—नव द्वार व अन्तःकरण चतुष्टय की तेरह व्यापक शक्तियों के द्वारा ‘सत्याकारास्त्रयोदश’ इस वाक्य में कहे गये सत्य के सब रूपों को जीत लेते हैं। मैं भी इसी प्रकार सत्य के त्रयोदश रूपों का विजेता बनूँ। २. रुद्र—दस इन्द्रियों व अन्तःकरण चतुष्टय की व्यापक शक्तियों के द्वारा चौदह विद्याओं के समूह को जीत लेते हैं। मैं भी चौदह विद्याओं के समूह का विजेता बनूँ [ षडङ्गमिश्रिता वेदा धर्मशास्त्रं पुराणकम्। मीमांसा तर्कमपि च एता विद्याश्चतुर्दश ] ३. आदित्य—दस इन्द्रियाँ अन्तःकरण चतुष्टय तथा हृदय की व्यापक शक्तियों के द्वारा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ व पाँच प्राणों के समूह को जीत लेते हैं। मैं भी इस समूह को जीतूँ। ४. आदित्य सोलह कलाओं की व्यापक शक्तियों के द्वारा सोलह कलाओं का विजय करते हैं। मैं भी इनका विजय करूँ तथा ५. प्रजापति सप्तदश शक्तियों से, अविनाशी तत्त्वों से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा मन व बुद्धि से बने सूक्ष्मशरीर का विजय करता है। मैं भी इसका विजेता बनूँ।
Essence
भावार्थ — १. हमें क्रमशः विकास करते हुए स्वस्थ शरीरवाला ‘वसु’, उत्तम ज्ञान देनेवाला ‘रुद्र’, सब गुणों का अंशदान करनेवाला ‘आदित्य’, कामादि सब शत्रुओं से अखण्डित ‘अदिति’ तथा सम्पूर्ण विकासों का स्वामी ‘प्रजापति’ बनना है। २. हमें सत्य के तेरह रूपों को, चतुर्दश विद्याओं को, इन्द्रिय दशक व प्राण पञ्चक को, सोलह कलाओं को तथा सत्रह तत्त्वों से बने सूक्ष्मशरीर को जीतना है। यही वस्तुतः सच्ची तपस्या है। इस तपस्या को करनेवाले हम ‘तापस’ बनते हैं। तापस ही प्रस्तुत मन्त्रों का ऋषि है।
Subject
वसवः—रुद्राः—आदित्याः—अदितिः—प्रजापतिः