Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 33

40 Mantra
9/33
Devata- मित्रादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- तापस ऋषिः Chhand- कृति, Swara- निषादः
Mantra with Swara
मि॒त्रो नवा॑क्षरेण त्रि॒वृत॒ꣳ स्तोम॒मुद॑जय॒त् तमुज्जे॑षं॒ वरु॑णो॒ दशा॑क्षरेण वि॒राज॒मुद॑जय॒त् तामुज्जे॑ष॒मिन्द्र॒ऽएका॑दशाक्षरेण त्रि॒ष्टुभ॒मुद॑जय॒त् तामुज्जे॑षं॒ विश्वे॑ दे॒वा द्वाद॑शाक्षरेण॒ जग॑ती॒मुद॑जयँ॒स्तामुज्जे॑षम्॥३३॥

मि॒त्रः। नवा॑क्षरे॒णेति॒ नव॑ऽअक्षरेण। त्रि॒वृत॒मिति॒ त्रि॒ऽवृत॑म्। स्तोम॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। तम्। उत्। जे॒ष॒म्। वरु॑णः। दशा॑क्षरे॒णेति॒ दश॑ऽअक्षरेण। वि॒राज॒मिति॒ वि॒ऽराज॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। ताम्। उत्। जे॒ष॒म्। इन्द्रः॑। एका॑दशाक्षरे॒णेत्येका॑दशऽअक्षरेण। त्रि॒ष्टुभ॑म्। त्रि॒स्तुभ॒मिति॑ त्रि॒ऽस्तुभ॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। ताम्। उत्। जे॒ष॒म्। विश्वे॑। दे॒वाः। द्वाद॑शाक्षरे॒णेति॒ द्वाद॑शऽअक्षरेण। जग॑तीम्। उत्। अ॒ज॒य॒न्। ताम्। उत्। जे॒ष॒म् ॥३३॥

Mantra without Swara
मित्रो नवाक्षरेण त्रिवृतँ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषँवरुणो दशाक्षरेण विराजमुदजयत्तामुज्जेषमिन्द्र ऽएकादशाक्षरेण त्रिष्टुभमुदजयत्तामुज्जेषँविश्वे देवा द्वादशाक्षरेण जगतीमुदजयँस्तामुज्जेषम् ॥

मित्रः। नवाक्षरेणेति नवऽअक्षरेण। त्रिवृतमिति त्रिऽवृतम्। स्तोमम्। उत्। अजयत्। तम्। उत्। जेषम्। वरुणः। दशाक्षरेणेति दशऽअक्षरेण। विराजमिति विऽराजम्। उत्। अजयत्। ताम्। उत्। जेषम्। इन्द्रः। एकादशाक्षरेणेत्येकादशऽअक्षरेण। त्रिष्टुभम्। त्रिस्तुभमिति त्रिऽस्तुभम्। उत्। अजयत्। ताम्। उत्। जेषम्। विश्वे। देवाः। द्वादशाक्षरेणेति द्वादशऽअक्षरेण। जगतीम्। उत्। अजयन्। ताम्। उत्। जेषम्॥३३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( मित्रः ) = [ प्रमीतेः त्रायते ] मृत्यु से अपने को बचानेवाला ( नवाक्षरेण ) = नौ व्यापक तत्त्वों के हेतु से—[ पाँच ज्ञानेन्द्रियों व पाँच कर्मेन्द्रियों में जिह्वा के दोनों ओर होने से कुल नौ ही गिनते हैं ] इन नौ इन्द्रियों की शक्ति के हेतु से ( त्रिवृतं स्तोमम् ) = त्रिगुणित ‘सत्त्व, रज व तम्’ अथवा वात, पित्त व कफ़ इन गुणों के समुदाय को ( उदजयत् ) = जीत लेता है। ( तम् ) = उस ‘त्रिगुणित गुण समुदाय’ को मैं भी ( उज्जेषम् ) = जीतनेवाला बनूँ। ‘सत्त्व, रज व तम्’ ‘स्तोम’ इसलिए हैं कि ये परस्पर मिले होते हैं और ‘उत्तम, मध्यम, निकृष्ट’ भेद से त्रिगुणित होकर ये नौ हो जाते हैं। इनके ठीक कार्य करने पर सब इन्द्रियाँ ठीक रहती हैं। इन्द्रियों का ठीक रहना ही स्वास्थ्य है, रोगों से बचना है। एवं, ( मित्र ) = रोगों से अपने को बचानेवाला इस त्रिवृत् स्तोम को जीतने का ध्यान करता है। 

२. ( वरुणः ) = श्रेष्ठ अथवा [ वारयति ] रोगों का निवारण करनेवाला, रोगों को उत्पन्न ही न होने देनेवाला ( दशाक्षरेण ) = दस व्यापक तत्त्वों के द्वारा अर्थात् ‘प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान—नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय’ इन दस प्राणशक्तियों की साधना के द्वारा ( विराजम् ) = विशिष्ट दीप्ति को ( उदजयत् ) = जीतता है ( ताम् ) = उस विशिष्ट दीप्ति को ( उज्जेषम् ) = मैं भी विजय करूँ। वस्तुतः प्राणशक्ति से ही रोग-निवारण सम्भव होता है और इस रोग-निवारण का परिणाम ‘स्वास्थ्य की दीप्ति’ है, उसे ही यहाँ ‘विराज्’ कहा गया है। 

३. ( इन्द्रः ) = सब इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव ( एकादशाक्षरेण ) = दस इन्द्रियाँ व ग्यारहवें मन की व्यापक शक्ति के द्वारा ( त्रिष्टुभम् ) = काम, क्रोध व लोभ के रोकने को [ स्तुभ् = stop ] ( उदजयत् ) = जीतता है, अर्थात् काम, क्रोध व लोभ को अपने में प्रवेश नहीं करने देता। ( ताम् ) = इस त्रिष्टुभ् को ( उज्जेषम् ) = मैं भी जीतूँ अर्थात् काम-क्रोधादि को अपने में उत्पन्न न होने दूँ। वैयक्तिक साधना के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है। 

४. अब इन्द्र अर्थात् कामादि शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला बनकर मैं ‘विश्वेदेवाः’ बनता हूँ। सब दिव्य गुणों को अपना पाता हूँ। ( द्वादशाक्षरेण ) = दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इन बारह व्यापक शक्तियों के द्वारा ( जगतीम् ) = सारे लोक को ( उदजयन् ) = जीत लेते हैं, ( ताम् ) = उस जगती को ( उज्जेषम् ) = मैं भी जीतनेवाला बनूँ। मनुष्य मन को वश में करके काम-क्रोधादि को जीतकर शान्ति प्राप्त करता है और बुद्धि का सम्पादन होने पर वह सारे व्यवहार को बुद्धिपूर्वक करता हुआ सारे लोक को अनुकूल बना पाता है। ऐसा कर लेने पर उसमें सब दिव्य गुणों का वास होता है।

५. [ क ] मन्त्र के कर्तृपदों का बोध यह है कि रोगों से अपने को बचाना, अर्थात् रोगों के साथ संघर्ष करके उनपर विजय पाना आवश्यक है। [ ख ] उससे भी उत्तम यह है कि हम वरुण बनें, रोगों को आने ही न दें। [ ग ] इन उद्देश्यों से हम ( इन्द्र ) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता बनें और काम आदि आसुर वृत्तियों का विद्रावण करनेवाले हों। इन वृत्तियों को दूर करके हम [ घ ] ( विश्वेदेवाः ) = सब दिव्य गुणों को अपने में विकसित करें। 

६. कर्मपदों का बोध इस रूप में है कि [ क ] परस्पर सम्बद्ध सत्त्व, रज व तम के स्तोमों को जीतकर हम [ ख ] नीरोग बनकर विशिष्ट दीप्तिवाले हों। शारीरिक दृष्टि से हम स्वास्थ्य की चमकवाले हों। [ ग ] अब काम, क्रोध व लोभ को जीतकर इन्हें अपने से पूर्णरूप से दूर करके [ घ ] सम्पूर्ण जगती के प्रिय बनें।

७. करणपदों का बोध यह है कि हम [ क ] सब इन्द्रियों के स्वास्थ्य का सम्पादन करें। [ ख ] दश प्राणों को स्वाधीन करें। [ ग ] इन्द्रियरूप घोड़ों को मनरूप लगाम द्वारा वशीभूत करके [ घ ] मनरूप लगाम को भी बुद्धिरूप सारथि द्वारा थामनेवाले हों, अर्थात् हमारे जीवनों में बुद्धि का सर्वोपरि महत्त्व हो।
Essence
भावार्थ — हम क्रमशः ‘मित्र, वरुण, इन्द्र व विश्वेदेवाः’ बनने का यत्न करें।
Subject
मित्र — वरुण — इन्द्र — विश्वेदेवाः