Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 32

40 Mantra
9/32
Devata- पूषादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- तापस ऋषिः Chhand- कृति, Swara- निषादः
Mantra with Swara
पू॒षा पञ्चा॑क्षरेण॒ पञ्च॒ दिश॒ऽउद॑जय॒त् ताऽउज्जे॑षꣳ सवि॒ता षड॑क्षरेण॒ षड् ऋ॒तूनुद॑जय॒त् तानुज्जे॑षं म॒रुतः स॒प्ताक्ष॑रेण स॒प्त ग्रा॒म्यान् प॒शूनुद॑जयँ॒स्तानुज्जे॑षं॒ बृह॒स्पति॑र॒ष्टाक्ष॑रेण गाय॒त्रीमुद॑जय॒त् तामुज्जे॑षम्॥३२॥

पू॒षा। पञ्चा॑क्षरे॒णेति॒ पञ्च॑ऽअक्षरेण। पञ्च॑। दिशः॑। उत्। अ॒ज॒य॒त्। ताः। उत्। जे॒ष॒म्। स॒वि॒ता। षड॑क्षरे॒णेति॒ षट्ऽअ॑क्षरेण। षट्। ऋ॒तून्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। तान्। उत्। जे॒ष॒म्। म॒रुतः॑। स॒प्ताक्ष॑रे॒णेति॑ स॒प्तऽअ॑क्षरेण। स॒प्त। ग्रा॒म्यान्। प॒शून्। उत्। अ॒ज॒य॒न्। तान्। उत्। जे॒ष॒म्। बृह॒स्पतिः॑। अ॒ष्टाक्ष॑रे॒णेत्य॒ष्टऽअक्ष॑रेण। गा॒य॒त्रीम्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। ताम्। उत्। जे॒ष॒म् ॥३२॥

Mantra without Swara
पूषा पञ्चाक्षरेण पञ्च दिशऽउदजयत्ता ऽउज्जेषँ सविता षडक्षरेण षडृतूनुदजयत्तानुज्जेषम्मरुतः सप्ताक्षरेण सप्त ग्राम्यान्पशूनुदजयँस्तानुज्जेषम्बृहस्पतिरष्टाक्षरेण गायत्रीमुदजयत्तामुज्जेषम् ॥

पूषा। पञ्चाक्षरेणेति पञ्चऽअक्षरेण। पञ्च। दिशः। उत्। अजयत्। ताः। उत्। जेषम्। सविता। षडक्षरेणेति षट्ऽअक्षरेण। षट्। ऋतून्। उत्। अजयत्। तान्। उत्। जेषम्। मरुतः। सप्ताक्षरेणेति सप्तऽअक्षरेण। सप्त। ग्राम्यान्। पशून्। उत्। अजयन्। तान्। उत्। जेषम्। बृहस्पतिः। अष्टाक्षरेणेत्यष्टऽअक्षरेण। गायत्रीम्। उत्। अजयत्। ताम्। उत्। जेषम्॥३२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( पूषा ) = अपना पोषण करनेवाला ( पञ्च ) = पाँच ( अक्षरेण ) = व्यापक तत्त्वों के द्वारा पृथिवी, जल, तेज, वायु व आकाश की अनुकूलता के द्वारा ( पञ्च दिशः ) = पाँचों दिशाओं को ( उदजयत् ) = जीत लेता है, पाँचों दिशाओं में उन्नति करता है। इसकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ—पार्थिव घ्राणेन्द्रिय, अम्मय रसनेन्द्रिय, तैजस् चक्षु, वायवीय त्वचा और आकाशैकदेशभूत श्रोत्रेन्द्रिय—ठीक प्रकार से विकसित होती हैं—पाँचों कर्मेन्द्रियों का यह ठीक विकास कर पाता है। इसके पाँचों प्राण इसके वश में होकर ठीक-ठीक कार्य करते हैं। इस प्रकार यह सचमुच ही पूषा बन जाता है। इसकी यह कामना पूर्ण होती है कि ( ताः उज्जेषम् ) = मैं भी इन पाँचों दिशाओं को जीत लूँ। 

२. ( सविता ) = सबका प्रेरक तथा सब ऐश्वर्यों से युक्त यह सूर्य ( षडक्षरेण ) = छह व्यापक शक्तियों के द्वारा—जो शक्तियाँ छह ऋतुओं को पैदा करने का कारण बनती हैं, उन शक्तियों के द्वारा ( षट् ऋतून् ) = छह ऋतुओं का ( उदजयत् ) = विजय करता है। ( तान् उज्जेषम् ) = मैं भी उन छह ऋतुओं का विजेता बनूँ। ये छह-की-छह ऋतुएँ मेरे अनुकूल हों। ऋतु शब्द ‘ऋ’ गतौ से बनकर छह गतियों का संकेत करता हैं। राजा के क्षेत्र में ये छह गतियाँ ‘सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव व समाश्रय’ इन शब्दों से कही जाती हैं। सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी पाँच कर्मेन्द्रियों व छठे मन की गतियाँ छह ऋतुओं से अभिप्रेत हैं। समय के अनुकूल उस-उस क्रिया के द्वारा मनुष्य सर्वदा स्वस्थ रह पाता है—कोई भी ऋतु उसके प्रतिकूल नहीं होती। 

३. ( मरुतः ) = [ मितराविणः ] परिमित बोलनेवाले योगसाधनरत मुनिलोग ( सप्ताक्षरेण ) = सात व्यापक तत्त्वों के द्वारा ( सप्त ) = सात ( ग्राम्यान् पशून् ) = इन्द्रिय-ग्रामों में निवास करनेवाले शीर्षण्य प्राणों को ( उदजयत् ) = जीत लेते हैं। मैं भी ( तान् उज्जेषम् ) = इन सप्त शीर्षण्य प्राणों का विजेता बनूँ। ‘पशु’ शब्द ‘दृश्’ धातु से बनता है। ‘दृश्’ की पर्यायभूत धातु ‘ऋष’ है; जिससे ‘ऋषि’ शब्द बनता है। एवं, पशु व ऋषि पर्याचवाची हो जाते हैं। इन्हीं सात ऋषियों का उल्लेख ‘सप्तऋषयः प्रतिहिताः शरीरे’ इस मन्त्र में हैं। शरीर पञ्चभूतों का बना होने से पञ्चभौतिक ग्राम-सा है। उस ग्राम में रहनेवाले ‘कर्णाविमौ नासिके अक्षणी मुखम्’ ये सप्त शीर्षण्य प्राण हैं। मितरावी मुनि इनका विजय करते हैं। मुख्यरूप से ये सात कहलाते हैं। इनकी साधना से सप्त ऋषि स्वस्थ रहते हैं। 

४. ( बृहस्पतिः ) = सर्वोच्च दिशा का अधिपति ( अष्टाक्षरेण ) = आठ व्यापक तत्त्वों के द्वारा ‘पञ्चभूत तथा अंहकार, महान् व अव्यक्त’ इस अष्टधा प्रकृति के द्वारा ( गायत्रीम् ) = [ गायाः प्राणाः तान् तत्रे ] प्राणरक्षा का ( उदजयत् ) = उत्कृष्ट विजय करता है ( ताम् ) = उस प्राणरक्षा को मैं भी ( उज्जेषम् ) = जीतनेवाला बनूँ। पञ्चभूतों की विजय से अन्नमय व प्राणमयकोशों का स्वास्थ्य प्राप्त होता है। स्थूल भूत अन्नमयकोश में काम करते हैं तो सूक्ष्म भूत प्राणमयकोश में। अहंकार के विजय से मनोमयकोश का स्वास्थ्य प्राप्त होता है और महान् के विजय से विज्ञानमयकोश स्वस्थ होता है। अव्यक्त प्रकृति-विजय से आनन्दमयकोश ठीक होता है। इस अष्टधा प्रकृति का विजय ही गायत्री का विजय है।

५. ‘पूषा, सविता, मरुतः, बृहस्पतिः’ इन कर्तृपदों से यह बात स्पष्ट है कि पोषण करनेवाला ही ऐश्वर्य का अधिपति होता है और प्राणसाधना करनेवाला मितरावी मुनि ही सर्वोच्च दिशा का अधिपति बनता है। 

६. मन्त्र के ‘पञ्च दिशा, षड् ऋतून्, सप्त ग्राम्यान् पशून् तथा गायत्रीम्’ इन कर्मपदों का उपदेश यह है कि [ क ] पाँचों दिशाओं में उन्नति करनेवाला, अर्थात् पृथिवी आदि सभी भूतों को अपने अनुकूल बनानेवाला ही सब ऋतुओं का विजेता बनता है। [ ख ] और सप्त शीर्षण्य प्राणों का विजेता ही अष्टधा प्रकृति का विजय कर पाता है। 

७. मन्त्र के करणपदों का संकेत स्पष्ट है कि हम [ क ] शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय व पाँच प्राण सभी दिशाओं में उन्नति करें। [ ख ] अपने जीवन में पाँचों कर्म-इन्द्रियों व मन—इन छह-की-छह गतियों को ठीक करें। [ ग ] सप्त शीर्षण्य प्राणों को सप्त मरुतों की साधना से ठीक रक्खें। [ घ ] ‘पञ्चभूत, अहंकार, महान् व अव्यक्त’ इस अष्टधा प्रकृति की अनुकूलता का सम्पादन करें।
Essence
भावार्थ — हमें अपने जीवनों में क्रमशः उन्नति करते हुए ‘पूषा, सविता, मरुतः व बृहस्पति’ बनना है।
Subject
पूषा — सविता — मरुतः — बृहस्पतिः