Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 26

40 Mantra
9/26
Devata- सोमाग्न्यादित्यविष्णुसूर्य्यबृहस्पतयो देवताः Rishi- तापस ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सोम॒ꣳ राजा॑न॒मव॑से॒ऽग्निम॒न्वार॑भामहे। आ॒दि॒त्यान् विष्णु॒ꣳ सूर्य्यं॑ ब्र॒ह्माणं॑ च॒ बृह॒स्पति॒ꣳ स्वाहा॑॥२६॥

सोम॑म्। राजा॑नम्। अव॑से। अ॒ग्निम्। अ॒न्वार॑भामह॒ इत्य॑नु॒ऽआर॑भामहे। आ॒दि॒त्यान्। विष्णु॑म्। सूर्य॑म्। ब्र॒ह्मा॑णम्। च॒। बृह॒स्पति॑म्। स्वाहा॑ ॥२६॥

Mantra without Swara
सोमँ राजानमवसेग्निमन्वारभामहे । आदित्यान्विष्णुँ सूर्यम्ब्रह्माणञ्च बृहस्पतिँ स्वाहा ॥

सोमम्। राजानम्। अवसे। अग्निम्। अन्वारभामह इत्यनुऽआरभामहे। आदित्यान्। विष्णुम्। सूर्यम्। ब्रह्माणम्। च। बृहस्पतिम्। स्वाहा॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘कैसे व्यक्ति को राजा बनाएँ’, इस विषय का वर्णन करते हुए प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि ( अवसे ) = रक्षणादि क्रियाओं के लिए ( अनु आरभामहे ) = पीछे चलते हुए हम उस राजा पर विश्वास करते हैं [ आरभ = to rely on ]। हमें राजा पर पूर्ण विश्वास है we have full faith [complete confidence] in him = हम उसके विरोध में ‘no confidence motion’ अविश्वास प्रस्ताव ही पेश नहीं करते रहते। हम उसके बनाये हुए नियमों का ठीक से पालन करते हैं। 

१. हम उस राजा पर विश्वास करते हैं जो ( सोमम् ) = गुण-सम्पन्न है, घमण्ड से रहित है तथा क्रूर मनोवृत्तिवाला नहीं है। 

२. ( राजानम् ) = जो ज्ञान की दीप्तिवाला है अथवा स्वास्थ्य के कारण चमकता है तथा प्रजा के जीवन को बड़ा व्यवस्थित = regulated करनेवाला है। 

३. ( अग्निम् ) = जो प्रगतिशील है, उत्तम नेतृत्व देनेवाला है। 

४. ( आदित्यान् ) = जो सदा उत्तमता का आदान करनेवाला है अथवा अग्निवत् शत्रुओं का दाहक है [ आदानात् आदित्यः ]। 

५. ( विष्णुम् ) = जो व्यापक व उदार मनोवृत्तिवाला है। 

६. ( सूर्यम् ) = [ सूरिषु विद्वत्सु भवम् ] सदा विद्वानों के सम्पर्क में रहनेवाला है। 

७. ( ब्रह्माणम् ) = जो चतुर्वेदवेत्ता है अथवा उत्पादक [ creator ] है—सदा उत्पादन के कार्यों में रुचिवाला है। ( च ) = और ८. ( बृहस्पतिम् ) =  सर्वोच्च दिशा का अधिपति है, अर्थात् अत्यन्त उच्च जीवनवाला है। ( स्वाहा ) = ऐसे राजा के लिए हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं और ऐसे राजा के लिए ही हम ( स्व+हा ) = अपने धन का नियत अंश कररूप में देते हैं। इन गुणों से युक्त राजा सच्चा ‘तापस’ = तपस्वी है। यही मन्त्र का ऋषि है।
Essence
भावार्थ — राजा के लिए सोमादि गुण-सम्पन्न होना आवश्यक है। ऐसे राजा में ही प्रजा पूर्ण रूप से विश्वास करती है और उसे उचित कर प्रदान करती है। 
Subject
राज-विश्वास