Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 25

40 Mantra
9/25
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- स्वराट त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वाज॑स्य॒ नु प्र॑स॒व आब॑भूवे॒मा च॒ विश्वा॒ भुव॑नानि स॒र्वतः॑। सने॑मि॒ राजा॒ परि॑याति वि॒द्वान् प्र॒जां पुष्टिं॑ व॒र्धय॑मानोऽअ॒स्मे स्वाहा॑॥२५॥

वाज॑स्य। नु। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वः। आ। ब॒भू॒व॒। इ॒मा। च॒। विश्वा॑। भुव॑नानि। स॒र्वतः॑। सने॑मि। राजा॑। परि॑। या॒ति॒। वि॒द्वान्। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। पुष्टि॑म्। व॒र्धय॑मानः। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। स्वाहा॑ ॥२५॥

Mantra without Swara
वाजस्य नु प्रसव आबभूवेमा च विश्वा भुवनानि सर्वतः । सनेमि राजा परियाति विद्वान्प्रजाम्पुष्टिँवर्धयमानो ऽअस्मे स्वाहा ॥

वाजस्य। नु। प्रसव इति प्रऽसवः। आ। बभूव। इमा। च। विश्वा। भुवनानि। सर्वतः। सनेमि। राजा। परि। याति। विद्वान्। प्रजामिति प्रऽजाम्। पुष्टिम्। वर्धयमानः। अस्मेऽइत्यस्मे। स्वाहा॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. राज्य-व्यवस्था के उत्तम होने पर गत मन्त्र की भावना के अनुसार जब कर आदि देने में कोई किसी प्रकार की ढील नहीं करता तब ( नु ) = निश्चय से ( वाजस्य ) = शक्ति व ज्ञान का ( प्रसवः ) = ऐश्वर्य ( इमा च विश्वा भुवनानि ) = इन सब लोकों में ( सर्वतः ) = सब ओर से—सब दृष्टिकोणों से ( आबभूव ) = उपस्थित होता है, अर्थात् राज्यव्यवस्था के उत्तम होने पर राष्ट्र के सभी लोग—राष्ट्र के सब प्रान्तों में निवास करनेवाली प्रजाएँ—शरीर, मन व बुद्धि सभी दृष्टिकोणों से उन्नत होती हैं। 

२. इस राष्ट्र का ( विद्वान् ) = ज्ञानी—प्रजा की ठीक-ठीक अवस्था को जाननेवाला ( राजा ) = राष्ट्र का व्यवस्थापक पुरुष ( सनेमि ) = [ नेमि = परिधि ] सदा मर्यादानुकूल आचरणवाला होता हुआ ( परियाति ) = राष्ट्र में चारों ओर गति करता है। ‘स ताननुपरिक्रामेत् सर्वानेव सदा स्वयम्’ = इस मनुवाक्य के अनुसार यह राष्ट्र के सब कर्मचारियों के कार्यों को स्वयं घूमकर देखा करता है। 

३. इस नियमित भ्रमण व निरीक्षण के द्वारा राष्ट्र-व्यवस्था को ठीक रखता हुआ यह राजा ( अस्मे ) = इन सब प्रजाओं के लिए ( प्रजां पुष्टिम् ) = सब प्रकार के विकास को [ प्र+जा ] तथा धन, शक्ति व ज्ञानादि के पोषण को ( वर्धयमानः ) = बढ़ाता हुआ होता है। राजा के नियमित निरीक्षण से सब कर्मचारी कार्यों को ठीक करते हैं और प्रजाओं का पोषण व शक्तियों का विकास ठीक प्रकार से होता रहता है। 

४. ( स्वाहा ) = इस राजा के लिए प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं अथवा ( स्व ) = कर रूप में देय धन को ( हा ) = प्रसन्नतापूर्वक देते हैं, इसे राष्ट्र-यज्ञ में एक आहुति समझते हैं। 
Essence
भावार्थ — राजा का जीवन अत्यन्त मर्यादित होना चाहिए। उसे राष्ट्र में सर्वत्र भ्रमण करते हुए राष्ट्र-कार्यों का उत्तमता से सञ्चालन करना चाहिए तभी प्रजा की शक्तियों का विकास व पोषण होता है।
Subject
‘प्रजा-पुष्टि’-वर्धन