Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 23

40 Mantra
9/23
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- स्वराट त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वाज॑स्ये॒मं प्र॑स॒वः सु॑षु॒वेऽग्रे॒ सोम॒ꣳ राजा॑न॒मोष॑धीष्व॒प्सु। ताऽअ॒स्मभ्यं॒ मधु॑मतीर्भवन्तु व॒यꣳ रा॒ष्ट्रे जा॑गृयाम पु॒रोहि॑ताः॒ स्वाहा॑॥२३॥

वाज॑स्यः। इ॒मम्। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वः। सु॒षु॒वे। सु॒सु॒व॒ इति सुसुवे। अग्रे॑। सोम॑म्। राजा॑नम्। ओष॑धीषु। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। ताः। अ॒स्मभ्य॑म्। मधु॑मती॒रिति॒ मधु॑ऽमतीः। भ॒व॒न्तु॒। व॒यम्। रा॒ष्ट्रे। जा॒गृ॒या॒म॒। पु॒रोहि॑ता॒ इति॑ पु॒रःऽहि॑ताः। स्वाहा॑ ॥२३॥

Mantra without Swara
वाजस्येमम्प्रसवः सुषुवे ग्रे सोमँ राजानमोषधीष्वप्सु । ताऽअस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु वयँ राष्टे जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा ॥

वाजस्यः। इमम्। प्रसव इति प्रऽसवः। सुषुवे। सुसुव इति सुसुवे। अग्रे। सोमम्। राजानम्। ओषधीषु। अप्स्वित्यप्ऽसु। ताः। अस्मभ्यम्। मधुमतीरिति मधुऽमतीः। भवन्तु। वयम्। राष्ट्रे। जागृयाम। पुरोहिता इति पुरःऽहिताः। स्वाहा॥२३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( इमं सोमं राजानम् ) = इस सौम्य गुणयुक्त अथवा सोमशक्ति-सम्पन्न राजा को, ( अग्रे ) = सबसे प्रथम ( ओषधीषु अप्सु ) = ओषधियों व जलों का ही खान-पान करने पर, अर्थात् भोजन में मद्य-मांसादि का प्रवेश न होने पर, ( वाजस्य ) = शक्ति व ज्ञान का ( प्रसवः ) =  उत्पादन ( सुषुवे ) = ऐश्वर्ययुक्त करता है, अर्थात् सात्त्विक भोजन से सौम्यता बनी रहती है और शक्ति व ज्ञान में वृद्धि होती है। 

२. ( ताः ) = वे ओषधियाँ व जल ( अस्मभ्यम् ) = हमारे लिए ( मधुमतीः ) =  माधुर्यवाली ( भवन्तु ) = हों, अर्थात् इन ओषधियों व जलों के खान-पान से हमारे मनों और व्यवहार में माधुर्य हो। 

३. ( वयं पुरोहिताः ) = हम पुरोहित ( राष्ट्रे ) = राष्ट्र में ( जागृयाम ) = सदा जागरूक रहें। ज्ञान-प्रकाश फैलाने का कार्य इनपर ही निर्भर है। ये सो जाएँ, तो राष्ट्र में अन्धकार-ही-अन्धकार हो जाए। एवं, ये राष्ट्र-पुरोहित वानस्पतिक भोजन करनेवाले हों, इनके व्यवहार में अत्यन्त माधुर्य हो, इनके प्रभाव से राजा व प्रजा के जीवन में भी मद्य- मांसादि का प्रवेश न हो और राजा को शक्ति व ज्ञान का ऐश्वर्य प्राप्त हो। 

५. ( स्वाहा ) = इस कार्य के लिए पुरोहित स्वार्थ के त्यागवाले हों।
Essence
भावार्थ — हम वानस्पतिक भोजन को ही अपनाते हुए शक्ति व ज्ञान के ऐश्वर्य का सम्पादन करनेवाले हों। हमारा व्यवहार अत्यन्त मिठास को लिये हुए हो। मांसाहार मनोवृत्ति को क्रूर बनाता है।
Subject
राष्ट्र-पुरोहित