Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 22

40 Mantra
9/22
Devata- दिशो देवताः Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृत् अत्यष्टि, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒स्मे वो॑ऽअस्त्विन्द्रि॒यम॒स्मे नृ॒म्णमु॒त क्रतु॑र॒स्मे वर्चा॑सि सन्तु वः। नमो॑ मा॒त्रे पृ॑थि॒व्यै नमो॑ मा॒त्रे पृ॑थि॒व्याऽइ॒यं ते॒ राड्य॒न्तासि॒ यम॑नो ध्रु॒वोऽसि ध॒रुणः॑। कृ॒ष्यै त्वा॒ क्षेमाय॑ त्वा र॒य्यै त्वा॒ पोषा॑य त्वा॥२२॥

अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। वः। अ॒स्तु॒। इ॒न्द्रि॒यम्। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। नृ॒म्णम्। उ॒त। क्रतुः॑। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। वर्चा॑सि। स॒न्तु॒। वः॒। नमः॑। मा॒त्रे। पृ॒थि॒व्यै। नमः॑। मा॒त्रे। पृ॒थि॒व्यै। इ॒यम्। ते॒। राट्। य॒न्ता। अ॒सि॒। यम॑नः। ध्रु॒वः। अ॒सि॒। ध॒रुणः॑। कृ॒ष्यै। त्वा॒। क्षेमा॑य। त्वा॒। र॒य्यै। त्वा॒। पोषा॑य। त्वा॒ ॥२२॥

Mantra without Swara
अस्मे वोऽअस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चाँसि सन्तु वः । नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्यैऽइयन्ते राड् यन्तासि यमनो धु्रवो सि धरुणः कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा ॥

अस्मेऽइत्यस्मे। वः। अस्तु। इन्द्रियम्। अस्मेऽइत्यस्मे। नृम्णम्। उत। क्रतुः। अस्मेऽइत्यस्मे। वर्चासि। सन्तु। वः। नमः। मात्रे। पृथिव्यै। नमः। मात्रे। पृथिव्यै। इयम्। ते। राट्। यन्ता। असि। यमनः। ध्रुवः। असि। धरुणः। कृष्यै। त्वा। क्षेमाय। त्वा। रय्यै। त्वा। पोषाय। त्वा॥२२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र की यज्ञियवृत्ति को ही प्रस्तुत मन्त्र में स्पष्ट करते हैं— १. ( वः ) = तुम्हारी ( इन्द्रियम् ) = सब इन्द्रियों की शक्ति ( अस्मे ) = हमारे लिए ( अस्तु ) = हो। प्रभु कहते हैं कि तू सब इन्द्रियों को हमारे प्रति अर्पण करनेवाला बन। 

२. तुम्हारा ( नृम्णम् ) = धन ( अस्मे ) = हमारे लिए हो। प्रभु के लिए होने का अभिप्राय स्पष्ट है कि वह ‘सर्वभूतहित’ के लिए विनियुक्त हो। ‘सर्वभूतहिते रतः’ व्यक्ति ही प्रभु का सच्चा भक्त है। ( उत ) = और ( क्रतुः ) = तुम्हारी प्रज्ञा व कर्म हमारे लिए हो। 

३. ( वः ) = तुम्हारी ( वर्चांसि ) = शक्तियाँ ( अस्मे ) = हमारे लिए ( सन्तु ) = हों। तुम्हारी शक्तियाँ स्वार्थ-सम्पादन में विनियुक्त न होकर सारे राष्ट्र के हित के लिए हों। 

४. तुम ( मात्रे पृथिव्यै नमः ) = इस पृथिवी माता का आदर करनेवाले होओ। ( मात्रे पृथिव्यै नमः ) = इस भूमि माता के लिए तुम्हारा नमन हो। ( इयम् ) = यह भूमिमाता ही ( ते राट् ) = तेरे सब कार्यों को नियमित [ regulated ] करनेवाली हो, अर्थात् तेरे सब कार्य मातृभूमि के हित के दृष्टिकोण से हों। 

५. ( यन्ता असि ) = तू अपने इस शरीररूप रथ का उत्तम नियन्ता = काबू में रखनेवाला है। 

६. तू ( यमनः ) = उद्यमशील है। 

७. ( ध्रुवः असि ) = तू स्थिर चित्तवृत्तिवाला है। 

८. तू ( धरुणः ) = धारणात्मक कर्मों में लगा हुआ है। 

९. ( कृष्यै त्वा ) = मैं तुझे कृषि के लिए प्रेरित करता हूँ और ( क्षेमाय त्वा ) = इसे कृषि के द्वारा कल्याण-प्राप्ति में लगाता हूँ। यह कृषि ही तेरे जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन होगी। 

१०. ( रय्यै त्वा ) = मैं तुझे धन के लिए प्राप्त कराता हूँ और इस प्रकार ( पोषाय त्वा ) = तुझे उचित प्रकार से पोषण में समर्थ करता हूँ। संक्षेप में यह कृषि ही तेरे क्षेम के लिए होगी और पोषण के लिए पर्याप्त धन हो जाएगा।
Essence
भावार्थ — १. यज्ञमय जीवन में हमारी इन्द्रियाँ, धन, प्रज्ञा व कर्म, और सब शक्तियाँ पृथिवी माता के लिए होती हैं। [ २ ] हमारा जीवन संयमवाला व धारणात्मक कर्मों में लगा हुआ होता है। [ ३ ] हम कृषि द्वारा क्षेम को सिद्ध करते हैं और पोषण के लिए पर्याप्त धन प्राप्त करते हैं।
Subject
यज्ञमय जीवन