Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 21

40 Mantra
9/21
Devata- यज्ञो देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- अत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आयु॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पतां प्रा॒णो य॒ज्ञेन॑ कल्पतां॒ चक्षु॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ श्रोत्रं॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पतां पृ॒ष्ठं य॒ज्ञेन॑ कल्पतां य॒ज्ञो य॒ज्ञेन॑ कल्पताम्। प्र॒जाप॑तेः प्र॒जाऽअ॑भूम॒ स्वर्देवाऽअगन्मा॒मृता॑ऽअभूम॥२१॥

आयुः॑। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। प्रा॒णः। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। चक्षुः॑। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। श्रोत्र॑म्। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। पृ॒ष्ठम्। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। य॒ज्ञः। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। प्र॒जाप॑ते॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तेः। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। अ॒भू॒म॒। स्वः॑। दे॒वाः॒। अ॒ग॒न्म॒। अ॒मृताः॑। अ॒भू॒म॒ ॥२१॥

Mantra without Swara
आयुर्यज्ञेन कल्पताम्प्राणो यज्ञेन कल्पताञ्चक्षुर्यज्ञेन कल्पताँ श्रोत्रँ यज्ञेन कल्पताम्पृष्ठँ यज्ञेन कल्पताँयज्ञो यज्ञेन कल्पताम् । प्रजापतेः प्रजाऽअभूम स्वर्देवा ऽअगन्मामृता ऽअभूम ॥

आयुः। यज्ञेन। कल्पताम्। प्राणः। यज्ञेन। कल्पताम्। चक्षुः। यज्ञेन। कल्पताम्। श्रोत्रम्। यज्ञेन। कल्पताम्। पृष्ठम्। यज्ञेन। कल्पताम्। यज्ञः। यज्ञेन। कल्पताम्। प्रजापतेरिति प्रजाऽपतेः। प्रजा इति प्रऽजाः। अभूम। स्वः। देवाः। अगन्म। अमृताः। अभूम॥२१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र के अनुसार जब राजा राष्ट्र की उत्तम व्यवस्था करता है तब सब लोगों के जीवन उत्तम बनते हैं और वे चाहते हैं कि १. ( आयुः ) = हमारा जीवन ( यज्ञेन ) = यज्ञ से ( कल्पताम् ) = [ क्लृप् सामर्थ्ये ] शक्तिशाली बने। हमारे जीवन में [ क ] ( देवपूजा ) = बड़ों का आदर हो। [ ख ] ( सङ्गतीकरण ) = हम सब परस्पर मेल से चलनेवाले हों। [ ग ] ( दान ) = हममें देने की वृत्ति सदा बनी रहे [ यज् देवपूजा सङ्गतीकरण दानेषु ]। ये बातें हमारे जीवन में शक्ति का सञ्चार करनेवाली हों। 

२. ( प्राणः ) = हमारी प्राणशक्ति ( यज्ञेन ) = यज्ञियवृत्ति से ( कल्पताम् ) =  वृद्धि को प्राप्त हो। यज्ञियवृत्ति में त्याग का अंश है, यह त्याग हमें विलास से बचाता है और विलास का अभाव हमारी प्राणशक्ति को पुष्ट करता है। प्राणशक्ति के पुष्ट होने पर हमारे सब अङ्ग-प्रत्यङ्ग—सब इन्द्रियाँ सशक्त होती हैं, अतः कहते हैं कि ३. ( चक्षुः ) = हमारी दृष्टिशक्ति ( यज्ञेन कल्पताम् ) = यज्ञ से सशक्त हो तथा ४. ( श्रोत्रम् ) = हमारे कान ( यज्ञेन कल्पताम् ) = यज्ञ से शक्तिशाली हों। 

५. ( पृष्ठम् ) = हमारी पृष्ठ [ पीठ ] ( यज्ञेन कल्पताम् ) = यज्ञ से शक्तिशाली बने। 

६. ( यज्ञः ) = हमारा यज्ञ भी ( यज्ञेन ) = यज्ञिय भावना से ( कल्पताम् ) = सफल हो। लोकहित के लिए किये गये कर्म यज्ञ हैं। ये कर्म भी सङ्गरहित होने पर और फल की इच्छा को छोड़कर किये जाने पर अत्यन्त उत्तम हो जाते हैं। यही यज्ञों को यज्ञिय भावना से करने का आशय है। देवों के यज्ञ इसी प्रकार के होते हैं। 

७. यज्ञ से अपने जीवनों को ओत-प्रोत करते हुए हम ( प्रजापतेः ) = प्रजाओं के रक्षक प्रभु के ( प्रजाः ) = सच्चे सन्तान ( अभूत् ) =  हों। प्रभु ने प्रजाओं को यज्ञ के साथ ही उत्पन्न किया था और कहा था कि इसी से तुम फूलो-फलोगे, अतः इन यज्ञों को करनेवाला व्यक्ति प्रभु का सच्चा पुत्र होता है। यह अपने यज्ञादि सुचरितों से प्रभु को प्रीणित करता है। 

८. इस प्रकार यज्ञों से हमारा जीवन दिव्य गुणों की वृद्धिवाला हो और ( देवाः ) = हे देवो! दिव्य गुणो! ( स्वः अगन्म ) = हम स्वर्ग को, सुखमय स्थिति को प्राप्त हों। अथवा उस स्वयं देदीप्यमान ज्योति प्रभु को प्राप्त करनेवाले हों। और ९. ( अमृताः अभूम ) = हम रोगरूप मृत्युओं से कभी आक्रान्त न हों।
Essence
भावार्थ — १. यज्ञों से हमारा जीवन शक्ति-सम्पन्न बनता है। २. यदि यज्ञ को यज्ञिय भावना से करते हैं तो हम प्रभु के सच्चे पुत्र होते हैं। ३. हमारा जीवन सुखमय व नीरोग होता है अथवा हम ऐहिक व आमुष्मिक कल्याण प्राप्त करते हैं।
Subject
यज्ञ और शक्ति