Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 1

40 Mantra
9/1
Devata- सविता देवता Rishi- इन्द्राबृहस्पती ऋषी Chhand- स्वराट आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
देव॑ सवितः॒ प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व य॒ज्ञप॑तिं॑ भगा॑य। दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केतं॑ नः पुनातु वा॒चस्पति॒र्वाजं॑ नः स्वदतु॒ स्वाहा॑॥१॥

देव॑। स॒वि॒त॒रिति॑ सवितः। प्र। सु॒व॒। य॒ज्ञम्। प्र। सु॒व॒। य॒ज्ञप॑ति॒मिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिम्। भगा॑य। दि॒व्यः। ग॒न्ध॒र्वः। के॒त॒पूरिति॑ केत॒ऽपूः। केत॑म्। नः॒। पु॒ना॒तु॒। वा॒चः। पतिः॑। वाज॑म्। नः॒। स्व॒द॒तु॒। स्वाहा॑ ॥१॥

Mantra without Swara
देव सवितः प्रसुव यज्ञम्प्रसुव यज्ञपतिम्भगाय । दिव्यो गन्धर्वः केतुपूः केतन्नः पुनातु वाचस्पतिर्वाजन्नः स्वदतु स्वाहा ॥

देव। सवितरिति सवितः। प्र। सुव। यज्ञम्। प्र। सुव। यज्ञपतिमिति यज्ञऽपतिम्। भगाय। दिव्यः। गन्धर्वः। केतपूरिति केतऽपूः। केतम्। नः। पुनातु। वाचः। पतिः। वाजम्। नः। स्वदतु। स्वाहा॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत अध्याय के अन्तिम मन्त्र में प्रभु से जीवन को पवित्र बनाने के लिए प्रार्थना की गई थी। उसी प्रार्थना को प्रकारान्तर से प्रस्तुत मन्त्र में करते हैं कि—१. हे ( सवितः देव ) = सबके प्रेरक, दिव्य गुणों के पुञ्ज अथवा प्रकाशमय प्रभो! ( यज्ञं प्रसुव ) = हममें यज्ञ की भावना को प्रेरित कीजिए। हमारा जीवन यज्ञशील हो। 

२. ( यज्ञपतिम् ) = यज्ञों के रक्षक को ( भगाय ) = ऐश्वर्य के लिए ( प्रसुव ) = प्रेरित कीजिए। अपने जीवन को यज्ञमय बनाता हुआ पुरुष ऐश्वर्य को प्राप्त करनेवाला हो। 

३. ( दिव्यः ) = सदा प्रकाश में स्थित होनेवाला वह [ दिवि भवः ] ( गन्धर्वः ) = [ गां धरति ] वेदवाणी को धारण करनेवाला ( केतपूः ) = [ केतं ज्ञानं पुनाति ] = हमारे ज्ञानों को पवित्र करनेवाला प्रभु ( नः ) = हमारे ( केतम् ) = ज्ञान को ( पुनातु ) = पवित्र करे। ज्ञान की पवित्रता ही सब पवित्रताओं का मूल है। ज्ञान पवित्र होने पर वाणी पवित्र होती है और वाणी के पवित्र होने पर क्रियाएँ पवित्र होती हैं। ‘विचार, उच्चार व आचार’ यह क्रम है। विचार की पवित्रता शब्दों में आती है, वही क्रिया में। 

४. ( वाचस्पतिः ) = वाणी का पति प्रभु ( नः ) = हमारे ( वाजम् ) = अन्न को ( स्वदतु ) = माधुर्यवाला करे। इस अन्न के माधुर्य पर वाणी व मन का माधुर्य निर्भर है। वस्तुतः बुद्धि का सौन्दर्य व पवित्रता भी इसी अन्न की मधुरता पर आश्रित है। 

५. ( स्वाहा ) = इस ज्ञान की पवित्रता व अन्न के मधुर परिणाम के लिए मैं स्वार्थ का त्याग करूँ, स्वार्थ से ऊपर उठूँ। राजस् व तामस् भोजनों का चस्का छोडूँ। भोजन सात्त्विक होगा तो ज्ञान भी पवित्र होगा और वाणी भी माधुर्ययुक्त होगी। 

६. ‘वाज’ शब्द का अर्थ शक्ति भी है। मेरी शक्ति मधुर हो, क्रूरता से ऊपर उठी हुई हो। शक्तिशाली बनकर मैं ‘इन्द्र’ बनूँ, ज्ञानी बनकर ‘बृहस्पति’। इस प्रकार मैं मन्त्र का ऋषि ‘इन्द्राबृहस्पती’ होऊँ।
Essence
भावार्थ — हमारा ज्ञान पवित्र हो। हमारा अन्न व शक्ति मधुर हो।
Subject
इन्द्र+बृहस्पति