Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 9

63 Mantra
8/9
Devata- गृहपतयो विश्वेदेवा देवताः Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- प्राजापत्या गायत्री,आर्षी उष्णिक्,स्वराट आर्षी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ बृह॒स्पति॑सुतस्य देव सोम त॒ऽइन्दो॑रिन्द्रि॒याव॑तः॒ पत्नी॑वतो॒ ग्रहाँ॑२ऽऋध्यासम्। अ॒हं प॒रस्ता॑द॒हम॒वस्ताद् यद॒न्तरि॑क्षं॒ तदु॑ मे पि॒ताभू॑त्। अ॒हꣳ सूर्य॑मुभ॒यतो॑ ददर्शा॒हं दे॒वानां॑ पर॒मं गुहा॒ यत्॥९॥

उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मगृ॑हीतः। अ॒सि॒। बृह॒स्पति॑सुत॒स्येति॒ बृह॒स्पति॑ऽसुतस्य। दे॒व॒। सो॒म॒। ते॒। इन्दोः॑। इ॒न्द्रि॒याव॑तः। इ॒न्द्रि॒यव॑त॒ इती॑न्द्रि॒यऽव॑तः। पत्नी॑वत॒ इति॒ पत्नी॑ऽवतः। ग्रहा॑न्। ऋ॒ध्या॒स॒म्। अ॒हम्। प॒रस्ता॑त्। अ॒हम्। अ॒वस्ता॑त्। यत्। अ॒न्तरिक्ष॑म्। तत्। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। मे॒। पि॒ता। अ॒भू॒त्। अ॒हम्। सू॑र्य्यम्। उ॒भ॒यतः॑। द॒द॒र्श॒। अ॒हम्। दे॒वाना॑म्। प॒र॒मम्। गुहा॑। यत् ॥९॥

Mantra without Swara
उपयामगृहीतो सि बृहस्पतिसुतस्य देव सोम त इन्दोरिन्द्रियावतं पत्नीवतो ग्रहाँ ऋध्यासम् । अहम्परस्तादहमवस्ताद्यदन्तरिक्षन्तदु मे पिताभूत् । अहँ सूर्यमुभयतो ददर्शाहन्देवानां परमङ्गुहा यत् ॥

उपयामगृहीत इत्युपयामगृहीतः। असि। बृहस्पतिसुतस्येति बृहस्पतिऽसुतस्य। देव। सोम। ते। इन्दोः। इन्द्रियावतः। इन्द्रियवत इतीन्द्रियऽवतः। पत्नीवत इति पत्नीऽवतः। ग्रहान्। ऋध्यासम्। अहम्। परस्तात्। अहम्। अवस्तात्। यत्। अन्तरिक्षम्। तत्। ऊँऽइत्यूँ। मे। पिता। अभूत्। अहम्। सूर्य्यम्। उभयतः। ददर्श। अहम्। देवानाम्। परमम्। गुहा। यत्॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की भाँति प्रस्तुत मन्त्र में भी पत्नी कथन करती है कि — आप ( उपयामगृहीतः असि ) = सुनियमों से स्वीकृत हैं। आपका जीवन यम-नियमवाला है। 

२. ( बृहस्पतिसुतस्य ) = सब ज्ञानों के पति, अथवा सर्वोच्च दिशा के पति के पुत्र, अर्थात् जिन्हें ज्ञानी, गुणोन्नत आचार्यों ने दूसरा जन्म देकर द्विज बनाया है, उस आपके, हे ( देव सोम ) = दिव्य गुणोंवाले तथा उत्पादक शक्ति से युक्त पते! ( इन्दोः ) = सोम की रक्षा के कारण शक्तिशाली ( इन्द्रियावतः ) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले तथा ( पत्नीवतः ) = उत्तम पत्नीवाले ( ते ) = आपके ( ग्रहान् ) = [ गृह्यन्ते विवाहकाले—द० ] विवाह के अवसर पर लिये गये व्रतों की ( ऋध्यासम् ) = मैं समृद्ध करनेवाली बनूँ। पति के व्रतों के पालन में पत्नी ने सहायक होना है। पत्नी की सहायता के बिना उन व्रतों की पूर्ति सम्भव नहीं। 

३. अब पत्नी अपने लिए कहती है कि ( अहम् ) = मैं ( परस्तात् ) = परलोक का ध्यान करनेवाली बनूँ और ( अहम् ) = मैं ( अवस्तात् ) = यहाँ इहलोक का भी ध्यान करनेवाली होऊँ। ‘उभे निपासि जन्मनी’ ये तीसरे मन्त्र के शब्द मुझपर भी लागू हों। 

४. ( यद् अन्तरिक्षम् ) = जो अन्तरिक्ष अर्थात् [ अन्तरा क्षि ] मध्यमार्ग है ( तत् उ ) = वह ही ( मे पिता अभूत् ) = मेरा रक्षक हुआ है, अर्थात् सदा मध्यमार्ग पर चलने से मैं रोगादि का शिकार नहीं होती। 

५. ( अहम् ) = मैं ( सूर्यम् ) = सूर्य को ( उभयतः ) = दोनों ओर ( ददर्श ) = देखती हूँ। एक तो ( अहम् ) = मैं उस सूर्य को देखती हूँ जो कि ( देवानां परमम् ) = देवताओं में सर्वोत्कृष्ट है, अर्थात् ३३ देवों का मुखिया द्युलोक में वर्त्तमान यह सूर्य है और ( गुहा यत् ) = जो ब्रह्मरूपी सूर्य हृदयरूपी गुहा में विद्यमान है। बाह्य सूर्य के व्रत में चलती हुई मैं निरन्तर क्रियाशील बनूँ और अन्तःसूर्य को देखने के कारण मैं अपनी क्रियाओं में मार्गभ्रष्ट नहीं होती।
Essence
भावार्थ — पति यम-नियम का पालन करनेवाला, ज्ञानी आचार्यों से शिक्षा पाया हुआ, शक्तिशाली तथा प्रशस्तेन्द्रिय हो और उत्तम पत्नी की सहायता से व्रतों का पालन करे। पत्नी भी इहलोक व परलोक दोनों को देखे, सदा मध्यमार्ग पर चले। वह बाह्य सूर्य से क्रियाशीलता की प्रेरणा ले और अन्तःसूर्य से मार्ग का ज्ञान प्राप्त करे जिससे भटक न जाए।
Subject
सूर्य का उभयतो दर्शन