Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 55

63 Mantra
8/55
Devata- इन्द्रादयो देवताः Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- आर्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इन्द्र॑श्च म॒रुत॑श्च क्र॒यायो॒पोत्थि॒तोऽसु॑रः प॒ण्यमा॑नो मि॒त्रः क्री॒तो विष्णुः॑ शिपिवि॒ष्टऽऊ॒रावास॑न्नो॒ विष्णु॑र्न॒रन्धि॑षः॥५५॥

इन्द्रः॑। च॒। म॒रुतः॑। च॒। क्र॒पाय॑। उ॒पोत्थि॑त॒ इत्यु॑प॒ऽउत्थि॑तः। असु॑रः। प॒ण्यमा॑नः। मि॒त्रः। क्री॒तः। विष्णुः॑। शि॒पि॒वि॒ष्ट इति॑ शिपिऽवि॒ष्टः। ऊ॒रौ। आस॑न्न॒ इत्याऽस॑न्नः। विष्णुः॑। न॒रन्धि॑षः ॥५५॥

Mantra without Swara
इन्द्रश्च मरुतश्च क्रयायोपोत्थितोसुरः पण्यमानः मित्रः क्रीतः विष्णुः शिपिविष्टऽऊरावासन्नो विष्णुर्नरन्धिषः प्रोह्यमाणः सोम॥

इन्द्रः। च। मरुतः। च। क्रयाय। उपोत्थित इत्युपऽउत्थितः। असुरः। पण्यमानः। मित्रः। क्रीतः। विष्णुः। शिपिविष्ट इति शिपिऽविष्टः। ऊरौ। आसन्न इत्याऽसन्नः। विष्णुः। नरन्धिषः॥५५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की समाप्ति ‘सोम-क्रयणी’ पर थी। ( क्रयाय ) = इस सोम के क्रय के लिए ( इन्द्रः च ) = मनुष्य को जितेन्द्रिय बनना है तथा साथ ही ( मरुतः च ) = प्राणों की साधना करनी है। जितेन्द्रियता व प्राणसाधना ये दो सोमरक्षा के मौलिक उपाय हैं। 

२. इस प्रकार जितेन्द्रियता व प्राणसाधना से सोम की ऊर्ध्वगति होती है [ उप up ] ( उत्थितः ) = ऊपर उठा हुआ यह सोम ( असुरः ) = प्राणशक्ति देनेवाला होता है [ असून् राति ]। शरीर का अङ्ग-प्रत्यङ्ग प्राणशक्ति के सञ्चारवाला हो जाता है। 

३. ( पण्यमानः ) = सब द्रव्यों को देकर खरीदा जाता हुआ यह सोम ( मित्रः ) = [ प्रमीतेः त्रायते ] रोगों से बचानेवाला होता है। 

४. ( क्रीतः ) = खरीदा गया यह सोम ( विष्णुः ) =  सारे शरीर में व्याप्त होनेवाला होता है। 

५. ( शिपिविष्टः ) = [ शिपिषु प्राणिषु प्रविष्टः ] प्राणियों में प्रविष्ट हुआ यह सोम ( ऊरौ ) = [ आच्छादने—द० ] सब ओर से रोगादि के आक्रमण से बचाने की क्रिया में ( आसन्नः ) = निकटतम उपाय होता है। 

६. ( विष्णुः ) = वस्तुतः शरीर में ही प्रविष्ट हुआ और सम्पूर्ण रुधिर में व्याप्त हुआ यह सोम ( न-रन्धिषः ) = अ-हन्ता, न नष्ट करनेवाला होता है अथवा मनुष्यों को धारण करनेवाले [ नरन्धि ] इस संसार को ज्ञान द्वारा समाप्त करनेवाला [ स्यति ] होता है, अर्थात् यह सुरक्षित हुआ सोम उस सोम [ परमात्मा ] को प्राप्त कराके मनुष्य को मुक्त कर देता है।
Essence
भावार्थ — हम सोमरक्षा द्वारा अपने को नाश से बचाएँ और इस संसार के आवागमन से ऊपर उठकर मुक्त होने का प्रयत्न करें।
Subject
इन्द्र-नरन्धिष