Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 54

63 Mantra
8/54
Devata- परमेष्ठीप्रजापतिर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृत् ब्राह्मी उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प॒र॒मे॒ष्ठ्यभिधी॑तः प्रजाप॑तिर्वा॒चि व्याहृ॑ताया॒मन्धो॒ऽअच्छे॑तः। सवि॒ता स॒न्यां वि॒श्वक॑र्मा दी॒क्षायां॑ पू॒षा सो॑म॒क्रय॑ण्याम्॥५४॥

प॒र॒मे॒ष्ठी। प॒र॒मे॒स्थीति॑ परमे॒ऽस्थी। अ॒भिधी॑त॒ इत्य॒भिऽधी॑तः। प्र॒जाप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। वा॒चि। व्याहृ॑ताया॒मिति॑ विऽआहृ॑तायाम्। अन्धः॑। अच्छे॑त॒ इत्यच्छ॑ऽइतः। स॒वि॒ता। स॒न्याम्। वि॒श्वक॒र्म्मेति॑ वि॒श्वऽक॑र्म्मा। दी॒क्षाया॑म्। पू॒षा। सो॒म॒क्रय॑ण्या॒मिति॑ सोम॒ऽक्रय॑ण्याम् ॥५४॥

Mantra without Swara
परमेष्ठ्यभिधीतः प्रजापतिर्वाचि व्याहृतायामन्धो अच्छेतः सविता सन्याँविश्वकर्मा दीक्षायाम्पूषा सोमक्रयण्यामिन्द्रश्च॥

परमेष्ठी। परमेस्थीति परमेऽस्थी। अभिधीत इत्यभिऽधीतः। प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। वाचि। व्याहृतायामिति विऽआहृतायाम्। अन्धः। अच्छेत इत्यच्छऽइतः। सविता। सन्याम्। विश्वकर्म्मेति विश्वऽकर्म्मा। दीक्षायाम्। पूषा। सोमक्रयण्यामिति सोमऽक्रयण्याम्॥५४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र के ऋषि ‘देवाः’ थे, वे सब देवों को अपने अनुकूल बनाकर उत्तम निवासवाले बनते हैं और इसी कारण ‘वसिष्ठ’ कहलाते हैं। वसुओं में सर्वाधिक वसु। ये अपनी इन्द्रियों, मन व बुद्धि पर पूर्ण प्रभुत्व के कारण ‘वशिष्ठ’ भी कहलाते हैं—सर्वोत्तम वशी। 

१. ( परमेष्ठी ) = ये अपने जीवन को उत्तम बनाते हुए परम स्थान पर पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। 

२. ये ( अभिधीतः ) = [ अभि = अन्दर-बाहर दोनों ओर, धीतम् = ध्यान ] अन्दर-बाहर दोनों ओर, क्या सृष्टि में और क्या शरीर में, ये उस प्रभु की महिमा का ही ध्यान करते हैं। शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग की रचना में, हिमाच्छदित पर्वतों, समुद्रों व पृथिवी के वनों व रेगिस्तानों—सभी में प्रभु की महिमा का दर्शन करते हैं। इस प्रकार अन्दर-बाहर प्रभु-महिमा को देखते हुए ये व्यक्ति पापों से ऊपर उठकर ‘परमे-ष्ठी’ बन जाते हैं। 

३. ( वाचि व्याहृतायाम् ) = वेदवाणी का अध्ययन करने पर ( प्रजापतिः ) = ये प्रजाओं के रक्षक बनते हैं। घरों में उत्तम सन्तानों का निर्माण करते हैं तो राष्ट्र के अधिकारी बनकर सारी प्रजा को अच्छा बनाने का प्रयत्न करते हैं। 

४. ( अच्छ इतः ) = उस प्रभु की ओर गया हुआ व्यक्ति ( अन्धः ) = [ अदृक् ] संसार की वस्तुओं को फिर नहीं देखता, इन वस्तुओं के प्रति उसकी ‘रति’ नष्ट हो जाती है, ब्रह्ममार्ग पर चलनेवाले के लिए सांसारिक आनन्द तुच्छ हो जाते हैं। 

५. ( सन्याम् ) = [ संभक्तौ ] सम्यक् यज्ञ द्वारा बाँटकर खाने से ( सविता ) = [ षु = ऐश्वर्य ] मनुष्य ऐश्वर्यशाली बनता है। देने से धन बढ़ता ही है—‘दक्षिणां दुहते सप्तमातरम् [ ऋ० ]’ देने से धन सप्तगुणित हो जाता है। 

६. ( दीक्षायाम् ) = व्रत ग्रहण करने पर मनुष्य ( विश्वकर्मा ) = देवशिल्पी—निर्माणात्मक कार्यों को कुशलता से करनेवाला बनता है। व्रती पुरुष की वृत्ति तोड़-फोड़ की न होकर निर्माण की होती है। 

७. ( सोमक्रयण्याम् ) = सोम का क्रयण, अर्थात् ‘द्रव्य-विनिमय’ अन्य द्रव्य देकर सोम लेने पर ( पूषा ) = मनुष्य पोषण की देवता बन जाता है, अर्थात् वह सब दृष्टिकोणों से पुष्ट होता है। सब द्रव्यों से वह सोम का विनिमय करने के लिए उद्यत होता है तो यह सोम उसके शरीर, मन व मस्तिष्क सभी को पुष्ट करता है।
Essence
भावार्थ — हम मन्त्रवर्णित ध्यान आदि उपायों द्वारा ‘परमेष्ठी’ बनने का प्रयत्न करें।
Subject
परमेष्ठी-पूषा