Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 52

63 Mantra
8/52
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- निचृत् आर्षी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स॒त्रस्य॒ऽऋद्धि॑र॒स्यग॑न्म॒ ज्योति॑र॒मृता॑ऽअभूम। दिवं॑ पृथि॒व्याऽअध्या॑रुहा॒मावि॑दाम दे॒वान्त्स्व॒र्ज्योतिः॑॥५२॥

स॒त्रस्य॑। ऋद्धिः॑। अ॒सि॒। अग॑न्म। ज्योतिः॑। अ॒मृ॑ताः। अ॒भू॒म॒। दिव॑म्। पृ॒थि॒व्याः। अधि। आ। अ॒रु॒हा॒म॒। अवि॑दाम। दे॒वान्। स्वः॑। ज्योतिः॑ ॥५२॥

Mantra without Swara
सत्रस्य ऽऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता ऽअभूम दिवम्पृथिव्या ऽअध्यारुहामाविदाम देवान्त्स्वर्ज्यातिः ॥

सत्रस्य। ऋद्धिः। असि। अगन्म। ज्योतिः। अमृताः। अभूम। दिवम्। पृथिव्याः। अधि। आ। अरुहाम। अविदाम। देवान्। स्वः। ज्योतिः॥५२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र के अनुसार घर में ‘रति-धृति व स्वधृति’ को समझनेवाले पति-पत्नी ‘धरुण’ पुत्र को प्राप्त करके कहते हैं कि— १. हे धरुण! तू ही ( सत्रस्य ) = हमारे इस गृहस्थ-यज्ञ की ( ऋद्धिः असि ) = समृद्धि व सफलता है। तुझे प्राप्त करके हमारा यह यज्ञ पूर्ण होता है। 

२. ( ज्योतिः अगन्म ) = हमने आज प्रकाश प्राप्त किया है। हमें अब अपने आगे अन्धकार प्रतीत नहीं होता। ( अमृताः अभूम ) = अब हम तुम्हारे द्वारा अमर हो गये हैं—‘प्रजाभिरग्ने अमृतत्वमश्याम’। 

३. अब हम गृहस्थ को समाप्त करके ( पृथिव्याः ) = इन पार्थिव भोगों से ( दिवे अध्यारुहाम ) = ऊपर उठकर ( द्युलोक ) = प्रकाशमय लोक में पहुँचने का प्रयत्न करें। ‘स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्’, हम सदा स्वाध्याय में तत्पर रहकर अपने ज्ञान को बढ़ानेवाले बनें। ( देवान् अविदाम ) = दिव्य गुणों को प्राप्त करें अथवा विद्वानों के समीप पहुँचें और अपने ज्ञान को बढ़ाकर ( स्वर्ज्योतिः ) = उस स्वयं देदीप्यमान ज्योति परमात्मा को प्राप्त करें।
Essence
भावार्थ — गृहस्थ की सफलता इसी बात में है कि हम धारणात्मक सन्तान को प्राप्त करें। उसके बाद स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को बढ़ाने में लगे रहें और विद्वानों के सम्पर्क में आते हुए हम स्वयं देदीप्यमान ज्योति प्रभु को प्राप्त करें।
Subject
प्रजा द्वारा अमृतत्व