Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 48

63 Mantra
8/48
Devata- प्रजापतयो देवताः Rishi- देवा ऋषयः Chhand- याजुषी पङ्क्ति,याजुषी जगती,साम्नी बृहती, Swara- धैवतः, मध्यमः
Mantra with Swara
व्रेशी॑नां त्वा॒ पत्म॒न्नाधू॑नोमि। कुकू॒नना॑नां त्वा॒ पत्म॒न्नाधू॑नोमि। भ॒न्दना॑नां त्वा॒ पत्म॒न्नाधू॑नोमि म॒दिन्त॑मानां त्वा॒ पत्म॒न्नाधू॑नोमि म॒धुन्त॑मानां त्वा॒ पत्म॒न्नाधू॑नोमि शु॒क्रं त्वा॑ शु॒क्रऽआधू॑नो॒म्यह्नो॑ रू॒पे सूर्य॑स्य र॒श्मिषु॑॥४८॥

व्रेशी॑नाम्। त्वा। पत्म॑न्। आ। धू॒नो॒मि॒। कुकू॒नना॑नाम्। त्वा॒। पत्म॑न्। आ। धू॒नो॒मि॒। भ॒न्दना॑नाम्। त्वा॒। पत्म॑न्। आ। धू॒नो॒मि॒। म॒दिन्त॑माना॒मिति॑ म॒दिन्ऽत॑मानाम्। त्वा॒। पत्म॑न्। आ। धू॒नो॒मि॒। म॒धुन्त॑माना॒मिति॑ म॒धुन्ऽत॑मानाम्। त्वा॒। पत्म॑न्। आ। धू॒नो॒मि॒। शु॒क्रम्। त्वा॒। शु॒क्रे। आ। धू॒नो॒मि॒। अह्नः॑। रू॒पे। सूर्य्य॑स्य। र॒श्मिषु॑ ॥४८॥

Mantra without Swara
व्रेशीनान्त्वा पत्मन्नाधूनोमि कुकाननानान्त्वा पत्मन्ना धूनोमि भन्दनानान्त्वा पत्मन्ना धूनोमि मदिन्तमानान्त्वा पत्मन्ना धूनोमि मधुन्तमानान्त्वा पत्मन्ना धूनोमि शुक्रन्त्वा शुक्र ऽआ धूनोम्यह्नो रूपे सूर्यस्य रश्मिषु ॥

व्रेशीनाम्। त्वा। पत्मन्। आ। धूनोमि। कुकूननानाम्। त्वा। पत्मन्। आ। धूनोमि। भन्दनानाम्। त्वा। पत्मन्। आ। धूनोमि। मदिन्तमानामिति मदिन्ऽतमानाम्। त्वा। पत्मन्। आ। धूनोमि। मधुन्तमानामिति मधुन्ऽतमानाम्। त्वा। पत्मन्। आ। धूनोमि। शुक्रम्। त्वा। शुक्रे। आ। धूनोमि। अह्नः। रूपे। सूर्य्यस्य। रश्मिषु॥४८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
राजा धनाधिक्य के कारण कहीं चरित्रभ्रष्ट न हो जाए, अतः राजपत्नी कहती है कि— १. ( व्रेशीनाम् ) = [ व्रजन्ति शेरते ] जो निष्प्रयोजन केवल दिखावे के लिए इधर-उधर घूमती हैं और खाली समय सोती हैं, उन सुरूप स्त्रियों में ( पत्मन् ) = गिर जानेवाले ( त्वा ) = तुझे ( आधूनोमि ) = सर्वतः कम्पित करती हूँ, अर्थात् उनके समीप जाने से तुझे रोकती हूँ। 

२. ( कुकूननानाम् ) = [ कु शब्दे कुवन्ति ] कोयल की भाँति मधुर स्वर में सङ्गीत के शब्दों को करनेवालियों में ( पत्मन् ) = गिर जानेवाले ( त्वा ) = तुझे ( आधूनोमि ) = सर्वतः कम्पित करती हूँ, अर्थात् उनके फन्दे में पड़ने से बचाती हूँ। 

३. ( भन्दनानाम् ) = [ भदि कल्याणे सुखे च ] अधिक-से-अधिक आराम के जीवनवाली इन स्त्रियों में ( पत्मन् ) = गिर जानेवाले ( त्वा ) = तुझे ( आधूनोमि ) = कम्पित करके इनसे दूर करती हूँ। 

४. ( मदिन्तमानाम् ) = मादकता को पैदा करनेवाली इन स्त्रियों में ( पत्मन् ) = गिर जानेवाले ( त्वा ) = तुझे ( आधूनोमि ) = कम्पित करके सर्वथा दूर करती हूँ। 

५. ( मधुन्तमानाम् ) = अतिशयेन माधुर्य गुण से युक्त, ऊपर से अत्यन्त मीठे व्यवहारवाली इन स्त्रियों में ( पत्मन् ) = गिर जानेवाले ( त्वा ) = तुझे ( आधूनोमि ) = कम्पित करके दूर करती हूँ। राजा को ही क्या, वस्तुतः सभी पतियों को आपातरम्य स्त्रियों के चंगुल में फँसकर अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना। 

६. इन स्त्रियों में न गिरकर ( शुक्रम् ) = [ शुच ] शुद्ध शुचि व पवित्र जीवनवाले ( त्वा ) = तुझे [ क ] ( शुक्रे ) = [ निमित्तसप्तमी ] वीर्यरक्षा के निमित्त ( आधूनोमि ) = मैं तुझे इन सबसे पृथक् करती हूँ। [ ख ] ( अह्नः रूपे ) = दिन के रूप के निमित्त तुझे इनसे अलग करती हूँ। जैसे दिन चमकता है उसी प्रकार तेरा जीवन भी स्वस्थ होकर चमकनेवाला होता है। [ ग ] ( सूर्यस्य रश्मिषु ) = सूर्य की रश्मियों के निमित्त मैं तुझे इनसे पृथक् करती हूँ। तू व्यसनों से बचकर ज्ञानरश्मियों से प्रकाशमय बना।
Essence
भावार्थ — असंयम या व्यभिचार मनुष्य को निर्वीर्य, निस्तेज व मूर्ख बना देता है। संयमी जीवनवाला उत्तम शुक्र [ वीर्य ] को प्राप्त होता है, उसका चेहरा दिन के प्रकाश के समान चमकता है और वह ज्ञानरश्मियों से सूर्य के समान देदीप्यमान होता है।
Subject
राजा का सदाचारित्व = सच्चरित्रता