Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 45

63 Mantra
8/45
Devata- ईश्वरसभेशौ राजानौ देवते Rishi- शास ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी त्रिष्टुप्,विराट आर्षी अनुष्टुप्, Swara- धैवतः, गान्धारः
Mantra with Swara
वा॒चस्पतिं॑ वि॒श्वक॑र्माणमू॒तये॑ मनो॒जुवं॒ वाजे॑ऽअ॒द्या हु॑वेम। स नो॒ विश्वा॑नि॒ हव॑नानि जोषद् वि॒श्वश॑म्भू॒रव॑से सा॒धुक॑र्म्मा। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतो॒ऽसीन्द्रा॑य त्वा वि॒श्वक॑र्मणऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा वि॒श्वक॑र्मणे॥४५॥

वा॒चः। पति॑म्। वि॒श्वक॑र्म्माण॒मिति॑ वि॒श्वऽक॑र्म्माणम्। ऊ॒तये॑। म॒नो॒जुव॒मिति॑ मनः॒ऽजुव॑म्। वाजे॑। अ॒द्य। हु॒वे॒म॒। सः। नः॒। विश्वा॑नि। हव॑नानि। जो॒ष॒त्। वि॒श्वश॑म्भू॒रिति॑ वि॒श्वऽश॑म्भूः। अव॑से। सा॒धुक॒र्म्मेति॑ सा॒धुऽक॑र्म्मा। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। इन्द्रा॑य। त्वा॒। वि॒श्वक॑र्म्मण॒ इति॑ वि॒श्वऽक॑र्म्मणे। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। इन्द्रा॑य। त्वा॒। वि॒श्वक॑र्म्मण॒ इति॑ वि॒श्वऽक॑र्म्मणे ॥४५॥

Mantra without Swara
वाचस्पतिँविश्वकर्माणमूतये मनोजुवँ वाजे ऽअद्या हुवेम । स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा । उपयामगृहीतो सीन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे ॥

वाचः। पतिम्। विश्वकर्म्माणमिति विश्वऽकर्म्माणम्। ऊतये। मनोजुवमिति मनःऽजुवम्। वाजे। अद्य। हुवेम। सः। नः। विश्वानि। हवनानि। जोषत्। विश्वशम्भूरिति विश्वऽशम्भूः। अवसे। साधुकर्म्मेति साधुऽकर्म्मा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। इन्द्राय। त्वा। विश्वकर्म्मण इति विश्वऽकर्म्मणे। एषः। ते। योनिः। इन्द्राय। त्वा। विश्वकर्म्मण इति विश्वऽकर्म्मणे॥४५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में ‘शास’ ने प्रभु की इस प्रेरणा को सुना था कि ‘विमृधे’ = शत्रुओं के कुचलने के लिए तुझे इस संसार में भेजा है। इन शत्रुओं से युद्ध करता हुआ ‘शास’ प्रभु से प्रार्थना करता है कि १. ( वाचस्पतिम् ) = वेदवाणी के पति, ( विश्वकर्माणम् ) = इस विश्व— संसाररूप कर्मवाले, अर्थात् संसार का निर्माण करनेवाले ( मनोजुवम् ) = हृदयस्थरूपेण प्रेरणा देनेवाले आपको ही ( अद्य ) = आज ( ऊतये ) = इन शत्रुओं के आक्रमण से अपनी रक्षा के लिए तथा ( वाजे ) = शक्ति-प्राप्ति के निमित्त ( हुवेम ) = पुकारते हैं। वस्तुतः हे प्रभो! आपसे ही शक्ति प्राप्त करके मैंने इन शत्रुओं को जीतना है। 

२. ( सः ) = वह प्रभु ( नः ) = हमारी ( विश्वानि हवनानि जोषत् ) = सब पुकारों को सुने। हम अपने को इस योग्य बनाएँ कि हमारी प्रार्थना प्रभु के द्वारा अवश्य सुनी जाए। 

३. वे प्रभु ही ( विश्वशम्भूः ) = सब प्रकार की शान्तिप्रदाता हैं। प्रभुकृपा से ही शरीरों के रोग, मनों की चिन्ताएँ दूर होती हैं और बुद्धियों की भ्रान्तियाँ भी वे प्रभु ही दूर करते हैं। 

४. वे प्रभु ( अवसे ) = हमारे रक्षण के लिए होते हैं और ( साधुकर्मा ) = हमारे माध्यम से सब उत्तम कर्मों को करनेवाले हैं। 

५. प्रभु ‘शास’ से कहते हैं ( उपयामगृहीतः असि ) = तू उपासना द्वारा यम-नियमों का स्वीकार करनेवाला है। ( इन्द्राय त्वा ) = तुझे जितेन्द्रिय बनने के लिए यह शरीर दिया गया है ( विश्वकर्मणे ) = तूने सब कर्म निर्माणात्मक ही करने हैं। ( एषः ते योनिः ) = यह शरीर ही तेरा घर है। ( इन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे ) = तूने जितेन्द्रिय बनना है और इस विश्व में सदा निर्माणात्मक कार्यों का करनेवाला बनना है।
Essence
भावार्थ — प्रभु वेदवाणी के पति हैं। वे हमें हृदयस्थरूपेण प्रेरणा देते हैं। हम उनकी प्रेरणा को सुनें और तदनुसार कर्मों को करते हुए जीवन को शान्त बनाएँ।
Subject
वाचस्पति विश्वकर्मा