Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 43

63 Mantra
8/43
Devata- पत्नी देवता Rishi- कुसुरुविन्दुर्ऋषिः Chhand- आर्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इडे॒ रन्ते॒ हव्ये॒ काम्ये॒ चन्द्रे॒ ज्योतेऽदि॑ते॒ सर॑स्वति॒ महि॒ विश्रु॑ति। ए॒ता ते॑ऽअघ्न्ये॒ नामा॑नि दे॒वेभ्यो॑ मा सु॒कृतं॑ ब्रूतात्॥४३॥

इडे॑। रन्ते॑। हव्ये॑। काम्ये॑। चन्द्रे॑। ज्योते॑। अदि॑ते। सर॑स्वति। महि॑। विश्रु॒तीति॒ विऽश्रु॑ति। ए॒ता। ते॒। अ॒घ्न्ये॒। नामा॑नि। दे॒वेभ्यः॑। मा॒। सु॒कृत॒मिति॒ सु॒ऽकृ॑तम्। ब्रू॒ता॒त् ॥४३॥

Mantra without Swara
इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योते दिते सरस्वति महि विश्रुति । एता ते अघ्न्ये नामानि देवेभ्यो मा सुकृतम्ब्रूतात् ॥

इडे। रन्ते। हव्ये। काम्ये। चन्द्रे। ज्योते। अदिते। सरस्वति। महि। विश्रुतीति विऽश्रुति। एता। ते। अघ्न्ये। नामानि। देवेभ्यः। मा। सुकृतमिति सुऽकृतम्। ब्रूतात्॥४३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में मुख्य भावना प्रभु के सम्पर्क में आने की है। प्रभु के सम्पर्क में आनेवाला यह व्यक्ति प्रभु की वेदवाणी का अध्ययन करता है और कहता है कि हे ( अघ्न्ये ) = [ अ हन् य ] कभी नष्ट न करने योग्य, अर्थात् बिना विच्छेद के निरन्तर पढ़ने योग्य वेदवाणि! तू ( देवेभ्यः ) = विद्वानों के द्वारा ( मा ) = मेरे लिए ( सुकृतम् ) = पुण्य का ( ब्रूतात् ) = उपदेश कर, अर्थात् विद्वान् आचार्यों से हम इस वेद का उपदेश सुनें और अपने कर्त्तव्यों को जानें। 

२. हे वेदवाणि! तू ( इडे ) = उपासनीय है [ ईड स्तुतौ = स्तोतुमर्हे—द० ईड्यते—म० ] अथवा ( इडा ) = इ-ला = A law = तू जीवन का एक कानून [ काण्ड ] है। प्रभु ने मनुष्य को यह शरीर देते हुए यह वेदवाणी रूप जीवन का नियम भी दे दिया कि तूने इसके अनुसार अपना जीवन चलाना है। 

३. ( रन्ते ) = यह वेदवाणी रमणीय है [ रमयति इति ] इस वेदवाणी में अत्यन्त सुन्दरता से कर्त्तव्यों व ज्ञानों का उपदेश दिया गया है। 

४. ( हव्ये ) = यह हव्या है, उच्चारण के योग्य है। इसका नियम से पाठ करना भी पुण्य के लिए है। आचार्य के शब्दों में पाठ करनेवाले भी श्रेष्ठ हैं, अर्थज्ञ तो श्रेष्ठतर हैं और क्रिया में लानेवाले श्रेष्ठतम। ५. ( काम्ये ) = यह चाहने योग्य है। अथवा ‘आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, द्रविण, ब्रह्मवर्चस् व मोक्ष’ आदि सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाली है।

६. इन सब कामनाओं को पूर्ण करने के कारण ही ( चन्द्रे ) = आह्लादित करनेवाली है। 

७. ( ज्योते ) = दीप्तिमय है, सब ज्ञानों का प्रकाश करनेवाली है। 

८. ( अदिते ) = ज्ञान के प्रकाश के द्वारा ही यह हमें न खण्डित करनेवाली है। हमारे शरीर, मन व बुद्धियों को उत्तम बनानेवाली है। 

९. ( सरस्वति ) = यह ज्ञान के जलवाली है। 

१०. ( महि ) = हमारे जीवनों को महनीय बनानेवाली है। 

११. ( विश्रुति ) = यह विविध ज्ञानों के श्रवणवाली है। इसमें सब विद्याओं का श्रवण होता है। 

१२. इस प्रकार हे ( अघ्न्ये ) = अहन्तव्य, सदा पठन के योग्य वेदवाणि! ( एता ते नामानि ) = ये उल्लिखित तेरे नाम हैं। तू विद्वानों के द्वारा हमें पुण्यों का उपदेश कर।
Essence
भावार्थ — वेदवाणी को ‘अघ्न्या’ जानकर हम उसका नित्य स्वाध्याय करें और अपने कर्त्तव्यों को जानकर पुण्य का आचरण करें। यह आचरण ही हमें ‘कुसुरु’ = प्रभु से मेलवाला व ‘विन्दु’  = मोक्षलाभ करनेवाला बनाएगा।
Subject
अघ्न्या