Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 42

63 Mantra
8/42
Devata- पत्नी देवता Rishi- कुसुरुविन्दुर्ऋषिः Chhand- स्वराट ब्राह्मी उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
आजि॑घ्र क॒लशं॑ म॒ह्या त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑वः। पुन॑रू॒र्जा निव॑र्त्तस्व॒ सा नः॑ स॒हस्रं॑ धुक्ष्वो॒रुधा॑रा॒ पय॑स्वती॒ पुन॒र्मावि॑शताद् र॒यिः॥४२॥

आ। जि॒घ्र॒। क॒लश॑म्। म॒हि॒। आ। त्वा॒। वि॒श॒न्तु॒। इन्द॑वः। पुनः॑। ऊ॒र्जा। नि। व॒र्त्त॒स्व॒। सा। नः॒। स॒हस्र॑म्। धु॒क्ष्व॒। उ॒रुधा॒रेत्यु॒रुऽधा॑रा। पय॑स्वती। पुनः॑। मा॒। आ। वि॒श॒ता॒त्। र॒यिः ॥४२॥

Mantra without Swara
आजिघ्र कलशम्मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रन्धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः ॥

आ। जिघ्र। कलशम्। महि। आ। त्वा। विशन्तु। इन्दवः। पुनः। ऊर्जा। नि। वर्त्तस्व। सा। नः। सहस्रम्। धुक्ष्व। उरुधारेत्युरुऽधारा। पयस्वती। पुनः। मा। आ। विशतात्। रयिः॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्रों में ‘षोडशी’ शब्द का प्रयोग कई बार हुआ है। प्रभु षोडशी इसलिए हैं कि वे सोलह कलाओं के स्वामी हैं और जीव षोडशी इसलिए है कि उसने इन सोलह कलाओं को धारण करना है। इन सोलह कलाओं का मूलस्थान प्रभु ‘कल-श’ कहलाते हैं ‘कलाः शेरते अस्मिन्’। पति पत्नी से कहता है कि तू ( कलशम् ) = इन कलाओं के आधारभूत प्रभु की ( आजिघ्र ) = चारों ओर गन्ध लेने का प्रयत्न कर। तुझे प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की महिमा का दर्शन हो। क्या दूध में, क्या फलों में, क्या शाकों में और क्या सन्तान के शरीर में—तुझे सर्वत्र प्रभु की महिमा दिखे। 

२. इस प्रभु की महिमा को स्मरण करती हुई तू ( मही ) = [ मह पूजायाम् ] उस प्रभु की उपासिका बन। 

३. इस उपासना से ( त्वा ) = तुझमें ( इन्दवः ) = शक्ति के कण अथवा ऐश्वर्य ( आविशन्तु ) = प्राप्त हों। प्रभु के सम्पर्क में आने से प्रभु की शक्ति तो प्राप्त होगी ही। 

४. इस प्रकार ( पुनः ) = फिर ( ऊर्जा ) = शक्ति से ( निवर्तस्व ) = ‘नि’ निश्चयपूर्वक ( वर्तस्व ) = वर्त्तमान हो, अर्थात् प्रभु-उपासना के द्वारा तू फिर से अपने को शक्ति से भर ले। 

५. शक्ति से परिपूर्ण हुई-हुई ( सा ) = वह तू ( नः ) = हमें ( सहस्रम् ) = आमोद-प्रमोद के साथ [ स+हस् ], बिना किसी प्रकार के क्रोध के, खेल-खेल में ही ( धुक्ष्व ) = प्रपूरित कर, घर के सब सभ्यों में अच्छाइयों को भरने का प्रयत्न कर। 

६. ( उरु धारा ) = [ उर्वी धारा यस्य, धारा = वाक् ] ज्ञान की वाणियों को खूब प्राप्त करनेवाली, स्वाध्याय के द्वारा निरन्तर अपने ज्ञान को बढ़ानेवाली ( पयस्वती ) = सर्वतः प्रशस्त आप्यायनवाली—स्वयं अपने शरीर, मानस व बौद्धिक विकास को करनेवाली बनकर तू सन्तानों के अन्दर भी उत्तमताओं को भरनेवाली बन। 

७. ( पुनः ) = फिर, अर्थात् उपर्युक्त बातों के होने पर ( मा ) = मुझे ( रयिः ) = धन ( आविशतात् ) = समन्ततः प्राप्त हो। उत्तम पत्नी जब घर के कार्य अच्छी प्रकार सँभाल लेती है तब पति निश्चिन्तता से गृहस्थ व्यय के लिए धनार्जन में लगता है।
Essence
भावार्थ — हम सर्वत्र प्रभु की महिमा देखें, प्रभु के उपासक बनें और प्रभु की शक्ति से अपने को शक्ति-सम्पन्न करें। प्रभु से अपना मेल करनेवाला व्यक्ति ‘कुसुरु’ है [ कुस् to embrace ] इस मेल से शक्ति-लाभ करनेवाला यह ‘विन्दु’ [ विन्दति = लभते ] है। एवं, इसका नाम ही ‘कुसुरुविन्दु’ पड़ गया है।
Subject
कलश का आघ्राण