Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 40

63 Mantra
8/40
Devata- गृहपतयो राजादयो देवताः Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- आर्षी गायत्री,स्वराट आर्षी गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अदृ॑श्रमस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जनाँ॒२ऽअनु॑। भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो॑ यथा। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ सूर्या॑य त्वा भ्रा॒जायै॒ष ते॒ योनिः॒ सूर्या॑य त्वा भ्रा॒जाय॑। सूर्य॑ भ्राजिष्ठ॒ भ्राजि॑ष्ठ॒स्त्वं दे॒वेष्वसि॒ भ्राजि॑ष्ठो॒ऽहं म॑नु॒ष्येषु भूयासम्॥४०॥

अदृ॑श्रम्। अ॒स्य॒। के॒तवः॑। वि। र॒श्मयः॑। जना॑न्। अनु॑। भ्राज॑न्तः। अ॒ग्नयः॑। य॒था॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। सूर्य्या॑य। त्वा॒। भ्रा॒जाय॑। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। सूर्या॑य। त्वा॒। भ्रा॒जाय॑। सूर्य्य॑। भ्रा॒जि॒ष्ठ॒। भ्राजि॑ष्ठः। त्वम्। दे॒वेषु॑। अ॒सि॒। भ्राजि॑ष्ठः। अ॒हम्। म॒नु॒ष्ये᳖षु। भू॒या॒सम् ॥४०॥

Mantra without Swara
अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु । भ्राजन्तो अग्नयो यथा । उपयामगृहीतोसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय । सूर्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वन्देवेष्वसि भ्राजिष्ठो हम्मनुष्येषु भूयासम् ॥

अदृश्रम्। अस्य। केतवः। वि। रश्मयः। जनान्। अनु। भ्राजन्तः। अग्नयः। यथा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। सूर्य्याय। त्वा। भ्राजाय। एषः। ते। योनिः। सूर्याय। त्वा। भ्राजाय। सूर्य्य। भ्राजिष्ठ। भ्राजिष्ठः। त्वम्। देवेषु। असि। भ्राजिष्ठः। अहम्। मनुष्येषु। भूयासम्॥४०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु के समान ओजिष्ठ बनता हुआ यह चाहता है कि ( जनान् अनु ) = अपनी शक्तियों का विकास करनेवाले लोगों को लक्ष्य करके प्राप्त होनेवाले ( अस्य ) = इस प्रभु के ( केतवः ) = जो प्रज्ञान हैं तथा ( वि रश्मयः ) = विशिष्ट रश्मियाँ हैं उनको ( अदृश्रम् ) = देखूँ। इस प्रकार देखूँ ( यथा ) = जैसे ( भ्राजन्तः ) = ज्ञान की ज्योति से दीप्त पुरुष और ( अग्नयः ) = उन्नतिशील पुरुष देखा करते हैं। इन केतुओं और रश्मियों को सदा देखनेवाला मैं अपने इस जीवन में ‘भ्राजमान’ बन सकूँगा। 

२. प्रभु इससे कहते हैं कि ( उपयामगृहीतः असि ) = तू सुनियमों से स्वीकृत जीवनवाला है ( सूर्याय त्वा भ्राजाय ) = तुझे मैंने इस संसार में सूर्य बनने के लिए, चमकने के लिए भेजा है। ‘पश्य सूर्यस्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन्’ = यह सूर्य चलता हुआ थकता नहीं, इसी से चमकता है। तूने भी क्रियाशील रहना है और इस सूर्य की भाँति चमकना है। ( एषः ते योनिः ) = यह शरीर ही तेरा घर है। ( सूर्याय त्वा भ्राजाय ) = तुझे सूर्य बनने के लिए तथा चमकने के लिए ही भेजा गया है। 

३. अब यह ( प्रस्कण्व ) = मेधावी पुरुष प्रभु से प्रार्थना करता है कि ( सूर्य ) = हे प्रभो! स्वाभाविकी क्रियावाले होते हुए आप सारे ब्रह्माण्ड को गति दे रहे हैं। सब लोगों को आप ही कर्मों में प्रेरित कर रहे हैं। ( भ्राजिष्ठ ) = हे सर्वतो दीप्तिमन् प्रभो ! ( त्वम् ) = आप ही ( देवेषु ) = देवों में ( भ्राजिष्ठः असि ) = सर्वाधिक दीप्तिवाले हैं। ( अहम् ) = मैं भी ( मनुष्येषु ) = मनुष्यों में ( भ्राजिष्ठः ) = सर्वाधिक दीप्तिवाला ( भूयासम् ) = होऊँ।
Essence
भावार्थ — हम ‘सूर्य’ की भाँति भ्राजिष्ठ बनें।
Subject
भ्राजिष्ठ