Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 38

63 Mantra
8/38
Devata- राजादयो गृहपतयो देवताः Rishi- वैखानस ऋषिः Chhand- भूरिक् त्रिपाद गायत्री,स्वराट आर्ची अनुष्टुप्,भूरिक् आर्ची अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः, षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॒ पव॑स्व॒ स्वपा॑ऽअ॒स्मे वर्चः॑ सु॒वीर्य॑म्। दध॑द्र॒यिं मयि॒ पोष॑म्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽस्य॒ग्नये॑ त्वा॒ वर्च॑सऽए॒ष ते॒ योनि॑र॒ग्नये॑ त्वा॒ वर्च॑से। अग्ने॑ वर्चस्वि॒न् वर्च॑स्वाँ॒स्त्वं दे॒वेष्वसि॒ वर्च॑स्वान॒हं म॑नु॒ष्येषु भूयासम्॥३८॥

अग्ने॑। पव॑स्व। स्वपा॒ इति॑ सु॒ऽअपाः॑। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। वर्चः॑ सु॒वीर्य्य॒मिति॑ सु॒ऽवीर्य्य॑म्। दध॑त्। र॒यिम्। मयि॑। पोष॑म्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वर्च॑से। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वर्च॑से। अग्ने॑। व॒र्च॒स्वि॒न्। वर्च॑स्वान्। त्वम्। दे॒वेषु॑। असि॑। वर्च॑स्वान्। अ॒हम्। म॒नु॒ष्ये᳖षु। भू॒या॒स॒म् ॥३८॥

Mantra without Swara
अग्ने पवस्व स्वपा ऽअस्मे वर्चः सुवीर्यम् । दधद्रयिम्मयि पोषम् उपयामगृहीतोस्यग्नये त्वा वर्चसेऽएष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे । अग्ने वर्चस्विन्वर्चस्वाँस्त्वन्देवेष्वसि वर्चस्वानहम्मनुष्येषु भूयासम् ॥

अग्ने। पवस्व। स्वपा इति सुऽअपाः। अस्मेऽइत्यस्मे। वर्चः सुवीर्य्यमिति सुऽवीर्य्यम्। दधत्। रयिम्। मयि। पोषम्। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। अग्नये। त्वा। वर्चसे। एषः। ते। योनिः। अग्नये। त्वा। वर्चसे। अग्ने। वर्चस्विन्। वर्चस्वान्। त्वम्। देवेषु। असि। वर्चस्वान्। अहम्। मनुष्येषु। भूयासम्॥३८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार ‘सात्त्विक सौम्य’ भोजन करनेवाला यह ( विवस्वान् ) = ज्ञान के प्रकाशवाला सब बुराइयों को समूल नष्ट कर डालता है। बुराइयों के वृक्ष को खोदकर उखाड़ डालने से यह ‘वैखानस’ कहलाता है। यह वैखानस प्रार्थना करता है कि— ( अग्ने ) = हे अग्रगति के साधक प्रभो! ( पवस्व ) = आप मेरे जीवन को पवित्र कर दीजिए। ( स्वपाः ) = [ सु अपस् ] आप ही सब उत्तम कार्यों को करनेवाले हैं। 

२. ( अस्मे ) = हमारे लिए ( वर्चः ) = वृत्त [ चरित्र ] और अध्ययन-सम्पत्ति को, सदाचार व शिक्षा को तथा ( सुवीर्यम् ) = उत्तम वीर्य को ( दधत् ) = आप धारण करनेवाले होओ। 

३. ( रयिम् ) = दान देने योग्य धन को तथा ( मयि ) = मुझमें ( पोषम् ) = पोषण को प्राप्त कीजिए। आपकी कृपा से मैं धन को भी प्राप्त करूँ और पोषण को भी। यदि ‘पोषम्’ को ‘रयिं’ का विशेषण कर दें तो अर्थ इस प्रकार होगा कि मैं पोषण के लिए आवश्यक धन को प्राप्त करनेवाला बनूँ। 

४. प्रभु इस वैखानस से कहते हैं कि ( उपयामगृहीतः असि ) = तूने उपासना द्वारा यम-नियमों को स्वीकार किया है। ( अग्नये त्वा ) =  तुझे इस संसार में अग्नि बनने के लिए भेजा है। ( वर्चसे ) = वृत्ताध्ययन-सम्पत्ति के लिए भेजा है। तूने उन्नतिशील, सदाचारी, शिक्षित और ज्ञानी बनना है। ( एषः ते योनिः ) = यह शरीर ही तेरा घर है। ( अग्नये त्वा वर्चसे ) = अग्रगति के लिए तथा वृत्ताध्ययन-सम्पत्ति के अर्जन के लिए ही तूने जीवन-यापन करना है। 

५. प्रभु की इस प्रेरणा को सुनकर ‘वैखानस’ प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे ( अग्ने ) = सारे ब्रह्माण्ड की अग्रगति के साधक! ( वर्चस्विन् ) = वृत्ताध्ययन- सम्पत्ति-सम्पन्न प्रभो! आप ही आदर्शरूप में अग्नि हो, आप ही वृत्त व विद्या के आदर्श हो। ( त्वम् ) = आप ( देवेषु ) = इन देवों में ( वर्चस्वान् ) = वर्चस्वाले ( असि ) = हैं। वस्तुतः इन देवों में आपका ही वर्चस् दीप्त हो रहा है। ( अहम् ) = मैं ( मनुष्येषु ) = मनुष्यों में ( वर्चस्वान् ) = वर्चस्वाला ( भूयासम् ) = बनूँ। मनुष्यों में मैं आपका प्रतीक बनने का प्रयत्न करूँ, जैसे देवों में आप, वैसे मनुष्यों में मैं।
Essence
भावार्थ — हम उस अग्नि के समान ‘वर्चस्वान्’ बनें।
Subject
वर्चस्वान्