Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 34

63 Mantra
8/34
Devata- गृहपतिर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- विराट आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यु॒क्ष्वा हि के॒शिना॒ हरी॒ वृष॑णा कक्ष्य॒प्रा। अथा॑ नऽइन्द्र सोमपा गि॒रामुप॑श्रुतिं॑ चर। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतो॒ऽसीन्द्रा॑य त्वा षोड॒शिन॑ऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा षोड॒शिने॑॥३४॥

यु॒क्ष्व। हि। के॒शिना॑। हरी॒ऽइति॒ हरी॑। वृष॑णा। क॒क्ष्य॒प्रेति॑ कक्ष्य॒ऽप्रा। अथ॑। नः॒। इ॒न्द्र॒। सो॒मपा॒ इति॑ सोमऽपाः। गि॒राम्। उप॑श्रुति॒मित्युप॑ऽश्रुतिम्। च॒र॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। इन्द्रा॑य। त्वा॒। षो॒ड॒शिने॑। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। इन्द्रा॑य। त्वा॒। षो॒ड॒शिने॑ ॥३४॥

Mantra without Swara
युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा । अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिञ्चर । उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिने ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने ॥

युक्ष्व। हि। केशिना। हरीऽइति हरी। वृषणा। कक्ष्यप्रेति कक्ष्यऽप्रा। अथ। नः। इन्द्र। सोमपा इति सोमऽपाः। गिराम्। उपश्रुतिमित्युपऽश्रुतिम्। चर। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। इन्द्राय। त्वा। षोडशिने। एषः। ते। योनिः। इन्द्राय। त्वा। षोडशिने॥३४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का इन्द्र यहाँ रथ में अश्वों का योजन करता है। प्रभु कहते हैं कि १. ( हि ) = निश्चय से ( युक्ष्व ) = तू इन इन्द्रियरूप घोड़ों को रथ में जोत। ये सदा चरते ही रह गये तो यात्रा कैसे पूरी होगी? चाहिए तो यह कि ये जुते-जुते ही बीच में थोड़ा खा-पी लें। 

२. कैसे घोड़ों का योजन? [ क ] ( केशिना ) = [ केशाः रश्मयः तेजोराशयः तद्वन्तौ ] ये घोड़े तेजोराशि-सम्पन्न हों, ज्ञानेन्द्रियरूप घोड़े खूब प्रकाशमय—ज्ञान के प्रकाशवाले हों तो कर्मेन्द्रियरूप घोड़े [ ख ] ( वृषणा ) = खूब शक्तिशाली हों। दोनों ही [ ग ] ( हरी ) = उद्दिष्ट स्थान पर ले-चलनेवाले हों तथा [ घ ] ( कक्ष्यप्रा ) = [ कक्षे भवं कक्ष्यं, मध्यबन्धनं प्रातः पूरयतः ] ये घोड़े मध्यबन्धन को भर लेनेवाले हों, अर्थात् खूब पुष्ट अवयवोंवाले हों, निर्बल न हों। इन्द्रियों को निर्बल करके वश में करने में क्या वीरता है, क्योंकि घोड़े ही निर्बल हो गये तो यात्रा पूरी कैसे होगी? 

३. ( अथ ) = अब, अर्थात् पुष्ट घोड़ों को रथ में जोतकर ( इन्द्र ) = हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! तू ( नः ) = हमारी ( गिराम् ) = वाणियों को ( उपश्रुतिम् ) = समीपता से श्रवण ( चर ) = कर। इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनकर मनुष्य प्रभु का उपासक हो और अन्तःस्थ प्रभु की वाणी को सुने। 

४. ( उपयामगृहीतः असि ) = तू प्रभु की उपासना द्वारा यम-नियमों से स्वीकृत जीवनवाला है। ( इन्द्राय त्वा षोडशिने ) = तुझे इस संसार में सोलह कलाओं से युक्त इन्द्र बनने के लिए भेजा गया है। ( एषः ते योनिः ) = यह शरीर ही तेरा घर है। तूने इधर-उधर भटकना नहीं। ( इन्द्राय त्वा षोडशिने ) = षोडशी इन्द्र बनने के लिए तुझे यह जीवन दिया गया है। इसे व्यर्थ समाप्त मत कर देना।
Essence
भावार्थ — हम इन्द्रियों को इस शरीररूपी रथ के घोड़े समझें। उन्हें रथ में जोतकर यात्रा को पूरा करें। इसी जीवन में हमने संयमी बनकर षोडशी बनना है। ‘इस प्रकार हमारी इच्छाएँ मधुर बनी रहीं’ तो हम मन्त्र के ऋषि ‘मधुच्छन्दा’ होंगे।
Subject
अश्वयोजन