Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 19

63 Mantra
8/19
Devata- विश्वेदेवा गृहपतयो देवताः Rishi- अत्रिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
याँ२ऽआव॑हऽउश॒तो दे॑व दे॒वाँस्तान् प्रेर॑य॒ स्वेऽअ॑ग्ने स॒धस्थे॑। ज॒क्षि॒वासः॑ पपि॒वास॑श्च॒ विश्वेऽसुं॑ घ॒र्मꣳ स्व॒राति॑ष्ठ॒तानु॒ स्वाहा॑॥१९॥

यान्। आ। अव॑हः। उ॒श॒तः। दे॒व॒। दे॒वान्। तान्। प्र। ई॒र॒य॒। स्वे। अ॒ग्ने॒। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। ज॒क्षि॒वास॒ इति॑ जक्षि॒ऽवासः॑। प॒पि॒वास॒ इति॑ पपि॒ऽवासः॑। च॒। विश्वे॑। असु॑म्। घ॒र्म्मम्। स्वः॑। आ। ति॒ष्ठ॒त॒। अनु॑। स्वाहा॑ ॥१९॥

Mantra without Swara
याँ ऽआवह उशतो देव देवाँस्तान्प्रेरय स्वे अग्ने सधस्थे । जक्षिवाँसः पपिवाँसश्च विश्वे सुङ्धर्मँ स्वरातिष्ठतानु स्वाहा ॥

यान्। आ। अवहः। उशतः। देव। देवान्। तान्। प्र। ईरय। स्वे। अग्ने। सधस्थ इति सधऽस्थे। जक्षिवास इति जक्षिऽवासः। पपिवास इति पपिऽवासः। च। विश्वे। असुम्। घर्म्मम्। स्वः। आ। तिष्ठत। अनु। स्वाहा॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में घरों में यज्ञों की परिपाटी का उल्लेख था। प्रस्तुत मन्त्र में उन यज्ञों के सम्पादन के लिए समय-समय पर सर्वहित की कामना करनेवाले विद्वानों को आमन्त्रित करने का वर्णन है, पर यह आमन्त्रण पत्नी की अनुकूलता के साथ ही होना चाहिए। मन्त्र का ‘सधस्थ’ शब्द इसी बात पर बल दे रहा है।

१. हे ( देव ) = उत्तम व्यवहारवाले व वासनाविजिगीषु गृहस्थ! ( यान् ) = जिन ( उशतः ) = मङ्गल की कामना करनेवाले ( देवान् ) = देवों को ( आवहः ) = [ आहूतवान् असि—द० ] आपने बुलाया है। हे ( अग्ने ) = घर की उन्नति करनेवाले! तू ( तान् ) = उन देवों को ( स्वे ) = अपने ( सधस्थे ) = सबके मिलकर ठहरने के स्थानभूत घर में, अर्थात् जिस घर में पति-पत्नी, घर के वृद्ध व सन्तान सभी मिलकर चल रहे हैं, जिसमें विरुद्धमति के कारण लड़ाई-झगड़ा नहीं है, उस घर में ( प्रेरय ) = प्रेरित कर, आने के लिए आमन्त्रित कर। 

२. यज्ञ हो चुकने पर ( जक्षिवांसः ) = जिन्होंने यज्ञशेष खाया है ( च ) = तथा ( पपिवांसः ) = शुद्ध जल का पान किया है ( विश्वे ) = वे तुम सब ( असुम् अनु ) = प्राणशक्ति को लक्ष्य बनाकर तथा ( घर्मं अनु ) = [ घर्म = यज्ञ—नि० ३।१७ ] यज्ञ को लक्ष्य बनाकर [ घर्म यज्ञ इसलिए है कि इससे मलों का क्षरण होता है और दीप्ति प्राप्त होती है—घृ क्षरणदीप्त्योः ] तथा ( स्वः अनु ) = स्वर्ग को तथा सुख को लक्ष्य बनाकर ( आतिष्ठत ) = सर्वथा उद्योग करो और ( स्वाहा ) = इसके लिए जितना भी ‘स्व’ का त्याग आवश्यक हो उतना ‘हा’ छोड़नेवाले बनो। 

३. घरों में विद्वान् अतिथियों के आने से यज्ञादि का कार्यक्रम चलता रहता है और वैषयिक वृत्ति न होने से प्राणशक्ति सुरक्षित रहती है—यज्ञ होते रहते हैं और घर सुखमय स्वर्ग-सा बन जाता है। ४. इस सबके लिए ( स्वाहा ) = स्वार्थत्याग आवश्यक है।
Essence
भावार्थ — हम घरों में विद्वान् अतिथियों को आमन्त्रित करें। उनपर यह प्रभाव न पड़े कि घर में पति-पत्नी में मेल नहीं है। हम यज्ञशेष के खानेवाले बनें। ‘प्राणशक्ति की वृद्धि, यज्ञों की प्रवृत्ति व घर को स्वर्गतुल्य बनाना’ हमारा लक्ष्य हो।
Subject
असु-घर्म-स्वः