Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 17

63 Mantra
8/17
Devata- विश्वेदेवा गृहपतयो देवताः Rishi- अत्रिर्ऋषिः Chhand- स्वराट आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धा॒ता रा॒तिः स॑वि॒तेदं जु॑षन्तां प्र॒जाप॑तिर्निधि॒पा दे॒वोऽअ॒ग्निः। त्वष्टा॒ विष्णुः॑ प्र॒जया॑ सꣳररा॒णा यज॑मानाय॒ द्रवि॑णं दधात॒ स्वाहा॑॥१७॥

धा॒ता। रा॒तिः। स॒वि॒ता। इदम्। जु॒ष॒न्ता॒म्। प्र॒जा॑पति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। नि॒धि॒पा इति॑ निधि॒ऽपाः। दे॒वः। अ॒ग्निः। त्वष्टा॑। विष्णुः॑। प्र॒जयेति॑ प्र॒ऽजया॑। स॒ꣳर॒रा॒णा इति॑ सम्ऽर॒रा॒णाः। यज॑मानाय। द्रवि॑णम्। द॒धा॒त॒। स्वाहा॑ ॥१७॥

Mantra without Swara
धाता रातिः सवितेदञ्जुषन्ताम्प्रजापतिर्निधिपा देवो अग्निः । त्वष्टा विष्णुः प्रजया सँरराणा यजमानाय द्रविणन्दधात स्वाहा ॥

धाता। रातिः। सविता। इदम्। जुषन्ताम्। प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। निधिपा इति निधिऽपाः। देवः। अग्निः। त्वष्टा। विष्णुः। प्रजयेति प्रऽजया। सꣳरराणा इति सम्ऽरराणाः। यजमानाय। द्रविणम्। दधात। स्वाहा॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गृहस्थ के प्रकरण को ही आगे ले-चलते हुए कहते हैं कि १. ( इदम् ) = इस गृहस्थ को ( जुषन्ताम् ) = प्रीतिपूर्वक सेवन करें। कौन? [ क ] ( धाता ) = [ धा = धारणपोषणयोः ] जो धारण व पोषण की योग्यता रखता है, अर्थात् जो गृहस्थ की आवश्यकताओं के लिए आवश्यक धन तो अवश्य कमाता है। [ ख ] ( रातिः ) = जो देनेवाला है [ रा दाने ]। गृहस्थ ने जहाँ अपने पालन-पोषण के लिए कमाना है वहाँ यज्ञों के लिए भी कमाना है। [ ग ] ( सविता ) = जो उत्पादक है, जो निर्माणात्मक कार्यों में लगता है और उत्पादन-शक्ति रखता है, अर्थात् सन्तान-निर्माण की योग्यता रखता है। [ घ ] ( प्रजापतिः ) = सन्तान की रक्षा करने में रुचिवाला है। [ ङ ] ( निधिपाः ) = अपने खज़ाने व कोश की रक्षा करनेवाला है। शरीर में उत्पन्न सोम ही इसकी वास्तविक निधि है, इस सोम की रक्षा से ही यह अपने ज्ञानकोश की भी रक्षा करता है। [ च ] ( देवः ) = यह उत्तम व्यवहारवाला है अथवा काम-क्रोधादि वासनाओं को जीतने की कामनावाला है [ दिव् = व्यवहार, विजिगीषा ]। [ छ ] ( अग्निः ) = प्र्रगतिशील है अथवा प्रकाश को प्राप्त तथा दोषों का दहन करनेवाला है। [ ज ] ( त्वष्टा ) = दिव्य गुणों का अपने में निर्माण करनेवाला [ त्वष्टा = देवशिल्पी ] अथवा सब बुराइयों को क्षीण करनेवाला [ त्वक्ष् =  तनूकरणे ] है। [ झ ] ( विष्णुः ) = व्यापक व उदार मनोवृत्तिवाला है [ विष्णु व्याप्तौ ]। 

२. उल्लिखित नौ गुणों से युक्त गृहस्थों से कहते हैं कि [ क ] ( प्रजया संरराणाः ) = अपने सन्तान के साथ [ संरराणाः = संरममाणाः ] आनन्द को अनुभव करते हुए, उन्हीं के साथ क्रीड़ा करते हुए, खेल-खेल में ही उनका शिक्षण करते हुए। [ ख ] ( यजमानाय ) = यज्ञशील पुरुष के लिए ( द्रविणम् ) = धन को ( दधात ) = धारण करनेवाले बनो, अर्थात् उत्तम कर्मों में लगे हुए, लोकहित के कार्यों में व्यापृत लोगों के लिए धनों को धारण करनेवाले बनो। इन्हें पात्र जानकर दान देनेवाले होओ। ( स्वाहा ) = इसके लिए स्वार्थत्याग तो करना ही है।
Essence
भावार्थ — १. धातृत्व आदि नव गुणों से युक्त पुरुष ही गृहस्थ में प्रवेश का अधिकारी है। २. उसे प्रजा के निर्माण में आनन्द अनुभव करना चाहिए, तथा ३. पात्रों में दान देनेवाला होना चाहिए।
Subject
गृहस्थ में कौन प्रवेश करे