Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 16

63 Mantra
8/16
Devata- गृहपतिर्देवता Rishi- अत्रिर्ऋषिः Chhand- विराट आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सं वर्च॑सा॒ पय॑सा॒ सं त॒नूभि॒रग॑न्महि॒ मन॑सा॒ सꣳशि॒वेन॑। त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ विद॑धातु॒ रायोऽनु॑मार्ष्टु त॒न्वो यद्विलि॑ष्टम्॥१६॥

सम्। वर्च॑सा। पय॑सा। सम्। त॒नूभिः॑। अग॑न्महि। मन॑सा। सम्। शि॒वेन॑। त्वष्टा॑। सु॒दत्र॒ इति॑ सु॒ऽदत्रः॑। वि। द॒धा॒तु॒। रायः॑। अनु॑। मा॒र्ष्टु॒। त॒न्वः᳖। यत्। विलि॑ष्ट॒मिति॒ विऽलि॑ष्टम् ॥१६॥

Mantra without Swara
सँवर्चसा पयसा सन्तनूभिरगन्महि मनसा सँ शिवेन । त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनु मार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम् ॥

सम्। वर्चसा। पयसा। सम्। तनूभिः। अगन्महि। मनसा। सम्। शिवेन। त्वष्टा। सुदत्र इति सुऽदत्रः। वि। दधातु। रायः। अनु। मार्ष्टु। तन्वः। यत्। विलिष्टमिति विऽलिष्टम्॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का अत्रि कहता है कि ( सुदत्रः ) = उत्तम ज्ञानों के दान से त्राण करनेवाले ( त्वष्टा ) = अविद्यादि दोषों को नष्ट करनेवाले प्रभु की कृपा से ( वर्चसा ) = ब्रह्मवर्चस् से ( पयसा ) =  आप्यायन [ वर्धन ] से ( तनूभिः ) = बलयुक्त शरीरों से ( शिवेन मनसा ) = शिवसंकल्पवाले मन से ( समगन्महि ) = हम सङ्गत हों। वह प्रभु ( रायः विदधातु ) = दान देने योग्य धनों को हममें धारण करें और ( तन्वः ) = शरीर का जो ( विलिष्टम् ) = न्यूनीभाव है, उसे ( अनुमार्ष्टु ) = ठीक कर डालें, शोध डालें, न्यूनता को दूर करके हमारी पूर्णता करें। हमारे शरीर, मन व मस्तिष्क में कहीं भी त्रुटि न रह जाए। हम ‘अ-त्रि’ बनें—हमारे शरीर भी त्रुटिशून्य हों, मन और मस्तिष्क भी।
Essence
भावार्थ — वे प्रभु हमें उत्तम ज्ञान का दान करके अल्पीभाव से शून्य करें। हम न्यूनताओं को दूर करके शरीर, मन व मस्तिष्क में पूर्णता का स्थापन करें।
Subject
‘सु-द-त्रः’