Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 10

63 Mantra
8/10
Devata- गृहपतयो देवताः Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- विराट ब्राह्मी बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अग्ना३इ पत्नी॑वन्त्स॒जूर्दे॒वेन॒ त्वष्ट्रा॒ सोमं॑ पिब॒ स्वाहा॑। प्र॒जाप॑ति॒र्वृषा॑सि रेतो॒धा रेतो॒ मयि॑ धेहि प्र॒जाप॑तेस्ते॒ वृष्णो॑ रेतो॒धसो॑ रेतो॒धाम॑शीय॥१०॥

अग्नाऽ२इ। पत्नी॑व॒न्निति॒ पत्नी॑ऽवन्। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वेन॑। त्वष्ट्रा॑। सोम॑म्। पि॒ब॒। स्वाहा॑। प्र॒जाप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। वृषा॑। अ॒सि॒। रे॒तो॒धा इति॑ रेतःऽधः। रेतः॑। मयि॑। धे॒हि॒। प्र॒जाप॑ते॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तेः। ते॒। वृष्णः॑। रे॒तो॒धस॒ इति॑ रेतः॒ऽधसः॑। रे॒तो॒धामिति॑ रे॒तःऽधाम्। अ॒शी॒य॒ ॥१०॥

Mantra without Swara
अग्ना३इ पत्नीवन्त्सजूर्देवेन त्वष्ट्रा सोमम्पिब स्वाहा । प्रजापतिर्वृषासि रेतोधा रेतो मयि धेहि प्रजापतेस्त वृष्णो रेतोधसो रेतोधामशीय ॥

अग्नाऽ२इ। पत्नीवन्निति पत्नीऽवन्। सजूरिति सऽजूः। देवेन। त्वष्ट्रा। सोमम्। पिब। स्वाहा। प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। वृषा। असि। रेतोधा इति रेतःऽधः। रेतः। मयि। धेहि। प्रजापतेरिति प्रजाऽपतेः। ते। वृष्णः। रेतोधस इति रेतःऽधसः। रेतोधामिति रेतःऽधाम्। अशीय॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पति के लिए कहते हैं— १. हे ( अग्ने ) = प्रगतिशील! ( पत्नीवन् ) = उत्कृष्ट पत्नीवाले! ( देवेन ) = दिव्य गुणों के पुञ्ज ( त्वष्ट्रा ) = सर्वदुःख विच्छेदक अथवा सर्वनिर्माता प्रभु के ( सजूः ) = साथ प्रीतिपूर्वक कार्यों का सेवन करनेवाला होकर तू ( सोमं पिब ) = सोम का पान कर। ( स्वाहा ) = इसके लिए तू स्वार्थों का, भोगवृत्ति का त्याग करनेवाला बन। भोगवृत्ति को छोड़कर सोम पान करने से तू भी छोटे रूप में ‘देव त्वष्टा’ बन सकेगा, अर्थात् सुन्दर दिव्य गुणोंवाली सन्तानों को जन्म दे सकेगा। 

२. तू इस सोमपान के कारण ( प्रजापतिः ) = उत्तम प्रजा का रक्षक है, ( वृषा असि ) = शक्तिशाली है तथा [ वृष = धर्म ] धर्ममय जीवनवाला है। ( रेतोधाः ) = इस सोमपान के कारण ही तू उचित ऋतु में रेतस् का आधान करनेवाला होता है। 

३. इस रेतोधा पति से पत्नी कहती है कि ( मयि रेतः धेहि ) = तू मुझमें रेतस् का आधान कर, जिससे मैं ( ते प्रजापतेः ) = प्रजा के रक्षक तुझ ( वृष्णः ) = शक्तिशाली तथा ( रेतोधसः ) = ऋतु में रेतस् का आधान करनेवाले के ( रेतोधाम् ) = वीर्यधारक, पराक्रमवाले पुत्र को ( अशीय ) = प्राप्त करूँ। वस्तुतः संयमी माता-पिता ही शक्तिशाली सन्तान को जन्म दे पाते हैं। माता-पिता भी शक्तिशाली, उनकी सन्तान भी शक्तिशाली। वे शक्ति को अपने में भरनेवाले सचमुच प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि ‘भरद्वाज’ हैं।
Essence
भावार्थ — पति-पत्नी ‘सोमपान’ करनेवाले और रेतस् का अपने में धारण करनेवाले हों, जिससे उनकी सन्तानें भी शक्तिशाली हों।
Subject
प्रजापति