Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 7

48 Mantra
7/7
Devata- वायुर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृत् जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ वा॑यो भूष शुचिपा॒ऽउप॑ नः स॒हस्रं॑ ते नि॒युतो॑ विश्ववार। उपो॑ ते॒ऽअन्धो॒ मद्य॑मयामि॒ यस्य॑ देव दधि॒षे पू॑र्व॒पेयं॑ वा॒यवे॑ त्वा॥७॥

आ। वा॒यो॒ऽइति॑ वायो। भू॒ष॒। शुचि॒पा॒ इति॑ शुचिऽपाः। उप॑ नः॒। स॒हस्र॑म्। ते॒। नि॒युत॒ इति॑ नि॒ऽयुतः॑। वि॒श्व॒वा॒रेति॑ विश्वऽवार। उपो॒ऽइत्यु॑पो॑। ते॒। अन्धः॑। मद्य॑म्। अ॒या॒मि॒। यस्य॑। दे॒व॒। द॒धि॒षे। पू॒र्वपेय॒मिति॑ पूर्वऽपेय॑म्। वा॒यवे॑। त्वा॒ ॥७॥

Mantra without Swara
आ यायो भूष शुचिपा उप नः सहस्रन्ते नियुतो विश्ववार । उपो तेऽअन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयँ वायवे त्वा ॥

आ। वायोऽइति वायो। भूष। शुचिपा इति शुचिऽपाः। उप नः। सहस्रम्। ते। नियुत इति निऽयुतः। विश्ववारेति विश्वऽवार। उपोऽइत्युपो। ते। अन्धः। मद्यम्। अयामि। यस्य। देव। दधिषे। पूर्वपेयमिति पूर्वऽपेयम्। वायवे। त्वा॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में गोतम ने वीर्यरक्षा द्वारा उदानवायु की साधना की थी। इस प्रकार संयमी जीवनवाला यह ‘वसिष्ठ’ बनता है। प्रभु इस वसिष्ठ से कहते हैं— १. ( वायो ) = [ वा गतिगन्धनयोः ] गति के द्वारा सब बुराइयों का हिंसन करनेवाले वसिष्ठ! ( आभूष ) = तू सब प्रकार से अपने को सुभूषित कर। तेरा शरीर स्वास्थ्य से, मन नैर्मल्य से और बुद्धि तीव्रता से अलंकृत हो। 

२. ( शुचिपाः ) = तू अत्यन्त शुद्धता को पालनेवाला हो। तेरा जीवन पवित्र-ही-पवित्र हो। 

३. हे ( विश्ववार ) = सब गुणों के स्वीकार करनेवाले वसिष्ठ! ( नः ) = हमारे ( सहस्रम् ) = हजारों ( नियुतः ) =  [ नियुज्यन्ते ये तान् निश्चितान् शमादिगुणान्—द० ] शम आदि गुणों को ( आभूष ) = अपने में सजा, अर्थात् इन गुणों के धारण से अपने जीवन को अलंकृत कर और ( ते ) = तेरे ये गुण तुझे ( नः उप ) = हमारे समीप लानेवाले हों। 

४. अब वसिष्ठ प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभो! मैं ( ते ) = तेरे ( मद्यम् ) = आनन्द देनेवाले ( अन्धः ) = आध्यायनीय सोमरूप अन्न को ( उ उप अयामि ) = निश्चय से समीपता से प्राप्त होता हूँ। इस सोम को अपने अन्दर सुरक्षित करता हूँ। उस सोम को ( यस्य ) = जिसके ( पूर्वपेयम् ) = पालन व पूरण करनेवाले पान को हे ( देव ) = दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभो! ( दधिषे ) = आप हमारे लिए धारण करते हैं, अर्थात् जिसका पान व रक्षण हम आपकी कृपा से कर पाते हैं। 

५. हे सोम! मैं ( वायवे त्वा ) = वायु बन सकूँ, इसलिए तेरा स्वीकार करता हूँ कि ( वायु ) = गतिशीलता के द्वारा मैं सब बुराइयों का दूर करनेवाला बनूँ।
Essence
भावार्थ — हम सोमरक्षा द्वारा शतशः शमादि गुणों से अपने जीवनों को अलंकृत करें।
Subject
पूर्व-पेय