Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 47

48 Mantra
7/47
Devata- वरुणो देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषिः Chhand- भूरिक् प्राजापत्या जगती,स्वराट प्राजापत्या जगती,निचृत् आर्ची जगती,विराट आर्ची जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ग्नये॑ त्वा॒ मह्यं॒ वरु॑णो ददातु॒ सोऽमृत॒त्त्वम॑शी॒यायु॑र्दा॒त्रऽए॑धि॒ मयो॒ मह्यं॑ प्रतिग्रही॒त्रे रु॒द्राय॑ त्वा॒ मह्यं॒ वरु॑णो ददातु॒ सोऽमृत॒त्त्वम॑शीय प्रा॒णो दा॒त्रऽए॑धि॒ वयो॒ मह्यं॑ प्रतिग्रही॒त्रे बृह॒स्पत॑ये त्वा॒ मह्यं॒ वरु॑णो ददातु॒ सोऽमृत॒त्त्वम॑शीय॒ त्वग्दा॒त्रऽए॑धि॒ मयो॒ मह्यं॑ प्रतिग्रही॒त्रे य॒माय॑ त्वा॒ मह्यं॒ वरु॑णो ददातु॒ सोऽमृत॒त्त्वम॑शीय॒ हयो॑ दा॒त्रऽए॑धि॒ वयो॒ मह्यं॑ प्रतिग्रही॒त्रे॥४७॥

अ॒ग्नये॑। त्वा॒। मह्य॑म्। वरु॑णः। द॒दा॒तु॒। सः। अ॒मृ॒त॒त्वमित्य॑मृत॒ऽत्वम्। अ॒शी॒य॒। आयुः॑। दा॒त्रे। ए॒धि॒। मयः॑। मह्य॑म्। प्र॒ति॒ग्र॒ही॒त्र इति॑ प्रतिऽग्रही॒त्रे। रु॒द्रा॑य। त्वा॒। मह्य॑म्। वरु॑णः। द॒दा॒तु॒। सः। अ॒मृ॒त॒त्वमित्य॑मृत॒ऽत्वम्। अ॒शी॒य॒। प्रा॒णः। दा॒त्रे। ए॒धि॒। वयः॑। मह्य॑म्। प्र॒ति॒ग्र॒ही॒त्र इति॑ प्रतिऽग्रही॒त्रे। बृह॒स्पत॑ये। त्वा॒। मह्य॑म्। वरु॑णः। द॒दा॒तु॒। सः। अ॒मृ॒त॒त्वमित्य॑मृत॒ऽत्वम्। अ॒शी॒य॒। त्वक्। दा॒त्रे। ए॒धि॒। मयः॑। मह्य॑म्। प्र॒ति॒ग्र॒ही॒त्र इति॑ प्रतिऽग्रही॒त्रे। य॒माय॑। त्वा॒। मह्य॑म्। वरु॑णः। द॒दा॒तु॒। सः। अ॒मृ॒त॒त्वमित्य॑मृत॒ऽत्वम्। अ॒शी॒य॒। हयः॑। दा॒त्रे। ए॒धि॒। वयः॑। मह्य॑म्। प्र॒ति॒ग्र॒ही॒त्र इति॑ प्रतिऽग्रही॒त्रे ॥४७॥

Mantra without Swara
अग्नये त्वा मह्यँवरुणो ददातु सो मृतत्वमशीयायुर्दात्रऽएधि मयो मह्यम्प्रतिग्रहीत्रे रुद्राय त्वा मह्यँवरुणो ददातु सो मृतत्वमशीय प्राणो दात्र एधि वयो मह्यम्प्रतिग्रहीत्रे बृहस्पतये त्वा मह्यँवरुणो ददातु सोमृतत्वमशीय त्वग्दात्रऽएधि मयो मह्यम्प्रतिग्रहीत्रे यमाय त्वा मह्यँवरुणो ददातु सोमृतत्वमशीय हयो दात्रऽएधि वयो मह्यम्प्रतिग्रहीत्रे ॥

अग्नये। त्वा। मह्यम्। वरुणः। ददातु। सः। अमृतत्वमित्यमृतऽत्वम्। अशीय। आयुः। दात्रे। एधि। मयः। मह्यम्। प्रतिग्रहीत्र इति प्रतिऽग्रहीत्रे। रुद्राय। त्वा। मह्यम्। वरुणः। ददातु। सः। अमृतत्वमित्यमृतऽत्वम्। अशीय। प्राणः। दात्रे। एधि। वयः। मह्यम्। प्रतिग्रहीत्र इति प्रतिऽग्रहीत्रे। बृहस्पतये। त्वा। मह्यम्। वरुणः। ददातु। सः। अमृतत्वमित्यमृतऽत्वम्। अशीय। त्वक्। दात्रे। एधि। मयः। मह्यम्। प्रतिग्रहीत्र इति प्रतिऽग्रहीत्रे। यमाय। त्वा। मह्यम्। वरुणः। ददातु। सः। अमृतत्वमित्यमृतऽत्वम्। अशीय। हयः। दात्रे। एधि। वयः। मह्यम्। प्रतिग्रहीत्र इति प्रतिऽग्रहीत्रे॥४७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. लेनेवाला ग्राह्य वस्तु को सम्बोधित करते हुए कहता है कि ( त्वा ) = तुझे ( मह्यं अग्नये ) = मुझ अग्नि के लिए ( वरुणः ) = पात्र का वरण करनेवाला दाता ( ददातु ) = दे। ( सः ) = वह मैं तुझे प्राप्त करके ( अमृतत्त्वम् अशीय ) = अमृतत्व को प्राप्त करूँ, अर्थात् तेरे अभाव में आवश्यक वस्तु की अप्राप्ति के कारण रोगादि की सम्भावना थी, वह अब न रहे। ( दात्रे ) = देनेवाले के लिए तू ( आयुः ) = आयु ( एधि ) = हो, उसके दीर्घ जीवन का कारण बन और ( मह्यं प्रतिगृहीत्रे ) = मुझ प्रतिग्रहीता के लिए तू ( मयः ) = सुख व नीरोगता का कारण हो। 

२. ( त्वा ) = तुझे ( मह्यं रुद्राय ) = मुझ रुद्र के लिए ( वरुणः ) = पात्र का वरण करनेवाला दाता ( ददातु ) = दे। ( सः ) = वह मैं तुझे प्राप्त करके ( अमृतत्त्वम् अशीय ) = अमृतत्व अर्थात् नीरोगता को प्राप्त करूँ। तू ( दात्रे ) = देनेवाले के लिए ( प्राणः ) = प्राणशक्ति ( एधि ) = हो। दाता की प्राणशक्ति बढ़े और ( मह्यं प्रतिग्रहीत्रे ) = मुझ प्रतिग्रहीता के लिए ( वयः ) = दीर्घजीवन हो। 

३. ( त्वा ) = तुझे ( मह्यं बृहस्पतये ) = मुझ ऊर्ध्वादिक् के अधिपति बृहस्पति के लिए ( वरुणः ) = पात्र का वरण करनेवाला दाता ( ददातु ) =  दे। ( सः ) = वह मैं ( अमृतत्वम् अशीय ) = अमरता को प्राप्त करूँ। ( दात्रे ) = दाता के लिए यह दान ( त्वक् ) = रक्षा करने का संवरण ( एधि ) = हो और ( मह्यं प्रतिग्रहीत्रे ) = मुझ प्रतिग्रहीता के लिए ( मयः ) = सुख व नीरोगता देनेवाला हो। 

४. ( त्वा ) = तुझे ( मह्यं यमाय ) = मुझ यम-नियमों से बद्ध जीवनवाले यम के लिए ( वरुणः ) = पात्र का वरण करनेवाला ( ददातु ) = दे। ( सः ) = वह मैं ( अमृतत्वम् ) = अमरता को  ( अशीय ) = प्राप्त करूँ। ( दात्रे ) = दाता के लिए तू ( हयः ) = घोड़ा—शक्ति का प्रतीक ( एधि ) = हो और ( मह्यं प्रतिग्रहीत्रे ) = मुझ प्रतिग्रहीता के लिए ( वयः ) = दीर्घजीवन हो।

ऊपर के मन्त्रार्थ में स्पष्ट है कि ‘प्रतिग्रहीता’ में निम्न गुण होने चाहिएँ—

[ क ] ( अग्नये ) = वह अग्नि हो [ अग् गतौ ], गतिशील हो। प्रकाश का फैलानेवाला व दोषों का जलानेवाला हो। [ ख ] ( रुद्राय ) = [ रुत्+र ] यह प्रजाओं को ज्ञान देनेवाला हो। रोरूयमाणो द्रवति = ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करते हुए विचरनेवाला हो। [ ग ] ( बृहस्पतये ) = यह ( ब्रह्मणस्पति ) = ज्ञान की वाणी का पति हो तथा सर्वोच्च दिशा का अधिपति हो, अर्थात् अधिक-से-अधिक उन्नत हो। [ घ ] ( यमाय ) = इसका जीवन यम-नियम से नियन्त्रित हो।

दान लेने का उद्देश्य यह है कि—‘अमृतत्वम् अशीय’ = इसका जीवन आवश्यक वस्तुओं की कमी के कारण रोगाक्रान्त व असमय में मृत्यु का ग्रास न हो जाए। अत्यन्त आवश्यक वस्तुओं के लिए ही दान ले, मौज की सामग्री के लिए नहीं। ‘मयः वयः’ = सुख—सब इन्द्रियों का स्वास्थ्य [ सु+ख ] व दीर्घजीवन प्राप्त हो सके यही लेने का उद्देश्य है।

दान देने का उद्देश्य यह है कि—दाता को दीर्घजीवन, प्राणशक्ति, वासनाओं के आक्रमण से बचाव तथा क्रियाशक्ति व वेग [ आयुः, प्राणः, त्वक्, हयः ] प्राप्त हो। दान मनुष्य को विलासवृत्ति से बचाकर इन सब वस्तुओं को प्राप्त कराता है। यज्ञशेष तो अमृत है। यह दान पाप से बचानेवाला सर्वोत्तम साधन है।

दाता का यह प्राथमिक कर्त्तव्य है कि वह ‘वरुण’ बने। वह वृ वरणे = पात्र का ही वरण करे। अपात्र में दिया हुआ दान न परलोक में कल्याण देता है न इहलोक में। व्यक्ति में अपात्रता की अधिक आशंका है, अतः समाज को दान देना श्रेयस्कर है।
Essence
भावार्थ — हम पात्र का विचार करके दान देनेवाले बनें।
Subject
दान व प्रतिग्रह का प्रयोजन