Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 42

48 Mantra
7/42
Devata- सूर्य्यो देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ꣳ सूर्य॑ऽआ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च॒ स्वाहा॑॥४२॥

चित्र॒म्। दे॒वाना॑म्। उत्। अ॒गा॒त्। अनी॑कम्। चक्षुः॑। मि॒त्रस्य॑। वरु॑णस्य। अ॒ग्नेः। आ। अ॒प्राः॒। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। अ॒न्तरि॑क्षम्। सूर्य्यः॑। आ॒त्मा। जग॑तः। त॒स्थुषः॑। च॒। स्वाहा॑ ॥४२॥

Mantra without Swara
चित्रन्देवानामुदगादनीकञ्चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षँ सूर्य ऽआत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा ॥

चित्रम्। देवानाम्। उत्। अगात्। अनीकम्। चक्षुः। मित्रस्य। वरुणस्य। अग्नेः। आ। अप्राः। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। अन्तरिक्षम्। सूर्य्यः। आत्मा। जगतः। तस्थुषः। च। स्वाहा॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र के अनुसार प्रभु का दर्शन करनेवाला ‘प्रस्कण्व’ = मेधावी पुरुष सब बुराइयों का संहार करनेवाला होता है। बुराइयों का संहार करने के कारण ही वह ‘कुत्स’ [ कुथ हिंसायाम् ] (  ) = आदरणीय हिंसक बनता है। यह कह उठता है कि यह प्रभु ( उदगात् ) = उदित हो गया, जोकि १. ( चित्रम् ) = [ चित्+र ] सम्पूर्ण ज्ञान को देनेवाला है। 

२. ( देवानां अनीकम् ) = सब देवों का बल है। वस्तुतः देवों को देवत्व प्राप्त करानेवाला यही है। यही ( मित्रस्य ) = अहरभिमानी देवता सूर्य का [ दिन के देवता ‘दिवा-कर’ का ] ( वरुणस्य ) = रात्रि के अभिमानी देवता चन्द्र का तथा ( अग्नेः ) = इस पृथिवीस्थ देवों के मुखिया अग्नि का ( चक्षुः ) = प्रकाशक है। 

३. इस प्रभु ने ही ( द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम् ) = द्युलोक, पृथिवीलोक तथा अन्तरिक्षलोक को ( आप्राः ) = व्याप्त किया हुआ है, पूरण किया हुआ है। 

४. ( सूर्यः ) = यही स्वयं प्रकाश है, अन्यों को प्रकाश देनेवाला है ५. ( आत्मा ) = [ अतति सर्वत्र व्याप्नोति ] सर्वत्र व्याप्त है। 

६. ( जगतः तस्थुषः च ) =  जङ्गम व स्थावर—सम्पूर्ण जगत् का यह ( स्वाहा ) = [ सु आह ] उत्तमता से उपदेश देनेवाला है।
Essence
भावार्थ — कुत्स वही बनता है जो सर्वत्र प्रभु की व्याप्ति को देखने का प्रयत्न करता है। उसी की शक्ति को सर्वत्र कार्य करता हुआ देखने पर मनुष्य निरभिमान हो जाता है।
Subject
कुत्स