Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 41

48 Mantra
7/41
Devata- सूर्य्यो देवता Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑। दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॒ꣳ स्वाहा॑॥४१॥

उत्। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। त्यम्। जा॒तवे॑दस॒मिति॑ जा॒तऽवे॑दसम्। दे॒वम्। व॒ह॒न्ति॒। के॒तवः॑। दृ॒शे। विश्वा॑य। सूर्य्य॑म्। स्वाहा॑ ॥४१॥

Mantra without Swara
उदु त्यञ्जातवेदसन्देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यँ स्वाहा ॥

उत्। ऊँऽइत्यूँ। त्यम्। जातवेदसमिति जातऽवेदसम्। देवम्। वहन्ति। केतवः। दृशे। विश्वाय। सूर्य्यम्। स्वाहा॥४१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का ‘वत्स’ प्रकृति से ऊपर उठकर प्रभु के गुणों को धारण करता है। यही बुद्धिमत्ता है। इस बुद्धिमत्ता के कारण यह ‘प्रस्कण्व’ [ मेधावी ] हो जाता है। ये ( केतवः ) =  [ केतुः = प्रज्ञा—नि० ३।९ ] प्रज्ञा के पुञ्ज ज्ञानी लोग ( उत् ) = निश्चय से इन प्राकृतिक भोगों से ऊपर उठकर [ उत् = out ] ( त्यम् ) = उस प्रसिद्ध ( जातवेदसम् ) = [ जाते-जाते विद्यते—नि० ७।१९ ] प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में वर्त्तमान ( देवम् ) = प्रकाशमय, सब-कुछ देनेवाले, चमकनेवाले और चमकानेवाले ( सूर्यम् ) = सबको हृदयस्थरूपेण कर्मों की प्रेरणा देनेवाले, सहस्र-सूर्यसम ज्योतिवाले उस प्रभु को ( विश्वाय दृशे ) = सब पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ( वहन्ति ) = धारण करते हैं। प्रभु का ज्ञान होने पर ब्रह्माण्ड के सब पदार्थों का ज्ञान हो जाता है। उपनिषद् में ‘कस्मिन्नु खलु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति’ किसके ज्ञात होने पर यह सारा ब्रह्माण्ड ज्ञात हो जाता है? इस प्रश्न का उत्तर यही दिया है कि आत्मतत्त्व का ज्ञान होने पर ही ऐसा होता है। ब्रह्मातिरिक्त सब पदार्थों का ज्ञान ‘शब्द-ब्रह्म’ या अपराविद्या’ है। इसके द्वारा ही वस्तुतः मनुष्य ‘परब्रह्म’ तक पहुँचता है। वहाँ पहुँच जाने पर ये सब ज्ञान अनायास हो जाते हैं।
Essence
भावार्थ — हम अपने इस मानव-जीवन को इसी प्रकार सफल कर सकते हैं कि प्रकृति से ऊपर उठें और उस ‘जातवेदस् देव’ का दर्शन करें।
Subject
प्रस्कण्व