Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 39

48 Mantra
7/39
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- भूरिक् पङ्क्ति,साम्नी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हाँ२ऽइन्द्रो॑ नृ॒वदा च॑र्षणि॒प्राऽउ॒त द्वि॒बर्हा॑ऽअमि॒नः सहो॑भिः। अ॒स्म॒द्र्यग्वावृधे वी॒र्यायो॒रुः पृ॒थुः सुकृ॑तः क॒र्तृभि॑र्भूत्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि महे॒न्द्राय॑ त्वै॒ष ते॒ योनि॑र्महे॒न्द्राय॑ त्वा॥३९॥

म॒हान्। इन्द्रः॑। नृ॒वदिति॑ नृ॒ऽवत्। आ। च॒र्ष॒णि॒प्रा इति॑ चर्षणि॒ऽप्राः। उ॒त। द्वि॒बर्हा॒ इति॑ द्वि॒बर्हाः॑। अ॒मि॒नः। सहो॑भि॒रिति॒ सहः॑ऽभिः। अ॒स्म॒द्र्य᳖क्। वा॒वृ॒धे॒। व॒वृ॒ध॒ इति॑ ववृधे। वी॒र्य्या᳖य। उ॒रुः। पृ॒थुः। सुकृ॑त॒ इति॒ सुऽकृ॑तः। क॒र्तृभि॒रिति॑ क॒र्तृ॒ऽभिः॑। भू॒त्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। म॒हे॒न्द्रायेति॑ महाऽइ॒न्द्रा॑य। त्वा॒। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। म॒हे॒न्द्रायेति॑ महाऽइ॒न्द्राय॑। त्वा॒ ॥३९॥

Mantra without Swara
महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः । अस्मर्द्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् । उपयामगृहीतो सि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा ॥

महान्। इन्द्रः। नृवदिति नृऽवत्। आ। चर्षणिप्रा इति चर्षणिऽप्राः। उत। द्विबर्हा इति द्विबर्हाः। अमिनः। सहोभिरिति सहःऽभिः। अस्मद्र्यक्। वावृधे। ववृध इति ववृधे। वीर्य्याय। उरुः। पृथुः। सुकृत इति सुऽकृतः। कर्तृभिरिति कर्तृऽभिः। भूत्। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। महेन्द्रायेति महाऽइन्द्राय। त्वा। एषः। ते। योनिः। महेन्द्रायेति महाऽइन्द्राय। त्वा॥३९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की भावना के अनुसार जब विश्वामित्र सोमरक्षा द्वारा अङ्ग-प्रत्यङ्ग को रमणीय बनाता है और प्रज्ञा को दीप्त करता है तब वह प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘भरद्वाज’ बन जाता है, अपने में शक्ति व ज्ञान को भरनेवाला। २. यह ( महान् ) = बड़ा बनता है, महनीय होता है। 

३. ( इन्द्रः ) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता होता है ४. ( नृवत् ) = [ नृ = नेता ] औरों के लिए नेता के समान होता है, औरों का मार्गदर्शक बनता है। 

५. ( आचर्षणिप्राः ) = मनुष्यों का समन्तात् पूरण करनेवाला होता है। 

६. ( उत ) = और ( द्विबर्हाः ) = दोनों क्षेत्रों में, अर्थात् ज्ञान व शक्ति के दोनों स्थानों में बढ़ा हुआ होता है। ज्ञान के दृष्टिकोण से ऋषि, तो शक्ति के दृष्टिकोण से मल्ल। 

७. ( सहोभिः ) = अपने बलों के कारण ( अमितः ) = अहिंसित होता है [ मीञ् हिंसायाम् ] अथवा अपने बलों से यह औरों की हिंसा करनेवाला नहीं बनता। 

८. ( अस्मद्र्यक् ) = प्रभु कहते हैं कि [ अस्मान् अञ्चति ] यह वह व्यक्ति है जो हमारी ओर आ रहा है। 

९. ( वावृधे वीर्याय ) = यह शक्ति के लिए निरन्तर बढ़ता चलता है। 

१०. ( उरुः ) = यह विशाल हृदयवाला होता है। 

११. ( पृथुः ) = विस्तृत शरीरवाला अथवा विशाल यशवाला व विस्तृत बलवाला [ यशसा विपुलः, बलेन विस्तृतः—म० ] १२. कर्तृभिः (  ) = अपने कर्त्तव्यों से ( सुकृतः ) = [ शोभनं कृतं यस्य ] उत्तम पुण्य कर्मोंवाला ( भूत् ) = होता है। 

१३. यह भरद्वाज प्रभु से प्रार्थना करता है कि ( उपयामगृहीतः असि ) = आप सुनियमों से स्वीकृत होते हो। ( त्वा ) = आपको मैं इसलिए उपासित करता हूँ कि ( महेन्द्राय ) = मैं महेन्द्र बन सकूँ। ( एषः ते योनिः ) = यह मेरा विग्रह [ शरीर ] आपका विशिष्ट गृह है। मैं ( त्वा ) = आपको इस गृह में प्रतिष्ठित करता हूँ जिससे ( महेन्द्राय ) = मैं भी महेन्द्र बन जाऊँ। ब्रह्म का उपासक ‘ब्रह्म-सा’ बन जाता है। उपासना में आगे और आगे बढ़ते हुए इन्द्र ‘महेन्द्र’-सा बन जाता है।
Essence
भावार्थ — उपासना में आगे और आगे बढ़ते हुए मनुष्य इन्द्र से महेन्द्र बनने का यत्न करे।
Subject
इन्द्र से महेन्द्र