Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 34

48 Mantra
7/34
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- आर्षी गायत्री,निचृत् आर्षी उष्णिक् Swara- ऋषभः, षड्जः
Mantra with Swara
विश्वे॑ देवास॒ऽआग॑त शृणु॒ता म॑ऽइ॒मꣳ हव॑म्। एदं ब॒र्हिर्निषी॑दत। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॑ऽए॒ष ते॒ योनि॒र्विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्यः॑॥३४॥

विश्वे॑। दे॒वा॒सः॒। आ। ग॒त॒। शृ॒णु॒त। मे॒। इ॒मम्। हव॑म्। आ। इ॒दम्। ब॒र्हिः। नि। सी॒द॒त॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। विश्वे॑भ्यः। त्वा॒। दे॒वेभ्यः॑। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। विश्वे॑भ्यः। त्वा। दे॒वेभ्यः॑ ॥३४॥

Mantra without Swara
विश्वे देवास आ गत शृणुता म इमँ हवम् । एदम्बर्हिर्नि षीदत । उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यऽएष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः ॥

विश्वे। देवासः। आ। गत। शृणुत। मे। इमम्। हवम्। आ। इदम्। बर्हिः। नि। सीदत। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। विश्वेभ्यः। त्वा। देवेभ्यः। एषः। ते। योनिः। विश्वेभ्यः। त्वा। देवेभ्यः॥३४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का मधुच्छन्दा सब दिव्य गुणों को अपनाकर प्रभु का सच्चा उपासक ‘गृत्स’ बनता है और आनन्दमय जीवनवाला होने के कारण ‘मद’ होता है। यह ‘गृत्समद’ प्रार्थना करता है कि १. ( विश्वे देवासः ) = हे सब दिव्य गुणो! ( आगत ) = आओ। ( मे ) = मेरी ( इमं हवम् ) = इस पुकार को, इस प्रार्थना को ( शृणुत ) = सुनो और ( इदम् ) = इस ( बर्हिः ) = वासनाशून्य हृदय में ( आनिषीदत ) = सर्वथा विराजमान होओ। जब हृदय में से वासनाओं का कूड़ा-करकट दूर कर दिया जाता है तब यह हृदयक्षेत्र दिव्य गुणों के बीजवपन के लिए तैयार हो जाता है। यह दिव्य गुण-बीजवपन ही प्रभु का सच्चा उपासन है। उपासना का यह परिणाम कम-से- कम होना ही चाहिए। 

२. यह गृत्समद प्रभु से कहता है कि ( उपयामगृहीतः असि ) = आप उपयामों से गृहीत होते हैं। ( विश्वेभ्यः त्वा देवेभ्यः ) = सब दिव्य गुणों के लिए मैं आपको स्वीकार करता हूँ। ( एषः ते योनिः ) = यह शरीर तेरा निवास-स्थान है। मैं तुझे अपने हृदय-मन्दिर में प्रतिष्ठित करता हूँ। ( विश्वेभ्यः त्वा देवेभ्यः ) = सब दिव्य गुणों के लिए तुझे स्वीकार करता हूँ।
Essence
भावार्थ — हम प्रभु के उपासक बनें। सदा प्रसन्न रहें, जिससे सब दिव्य गुणों के पात्र हों।
Subject
विश्वेदेवाः