Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 30

48 Mantra
7/30
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- देवश्रवा ऋषिः Chhand- साम्नी गायत्री,आसुरी अनुष्टुप्,याजुषी पङ्क्ति,आसुरी उष्णिक् Swara- ऋषभः, षड्जः
Mantra with Swara
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ मध॑वे त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ माध॑वाय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि शु॒क्राय॑ त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ शुच॑ये त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ नभ॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि नभ॒स्याय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसी॒षे त्वो॑पया॒मगृ॑हीतोऽस्यू॒र्जे त्वो॑पया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ सह॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि सह॒स्याय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ तप॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि तप॒स्याय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽस्यꣳहसस्प॒तये॑ त्वा॥३०॥

उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। मध॑वे। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। माध॑वाय। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। शु॒क्राय॑। त्वा॒। उ॒प॒या॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। शुच॑ये। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। नभ॑से। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। न॒भ॒स्या᳖य। त्वा॒। उ॒पा॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। इ॒षे। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मगृ॑हीतः। अ॒सि॒। ऊ॒र्ज्जे। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। सह॑से। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। स॒ह॒स्या᳖य। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। तप॑से। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। त॒प॒स्या᳖य। त्वा॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। अ॒ꣳह॒स॒स्प॒तये॑। अ॒ꣳह॒सः॒प॒तय॒ इत्य॑ꣳहसःऽप॒तये॑। त्वा॒ ॥३०॥

Mantra without Swara
उपयामगृहीतोसि मधवे त्वोपयामगृहीतोसि माधवाय त्वोपयामगृहीतोसि शुक्राय त्वोपयामगृहीतोसि शुचये त्वोपयामगृहीतोसि नभसे त्वोपयामगृहीतोसि नभस्याय त्वोपयामगृहीतोसीषे त्वोपयामगृहीतोस्यूर्जे त्वोपयामगृहीतोसि सहसे त्वोपयामगृहीतोसि सहस्याय त्वोपयामगृहीतोसि तपसे त्वोपयामगृहीतोसि तपस्याय त्वोपयामगृहीतो स्यँहसस्पतये त्वा ॥

उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। मधवे। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। माधवाय। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। शुक्राय। त्वा। उपयामऽगृहीतः। असि। शुचये। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। नभसे। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। नभस्याय। त्वा। उपायामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। इषे। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामगृहीतः। असि। ऊर्ज्जे। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। सहसे। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। सहस्याय। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। तपसे। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। तपस्याय। त्वा। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। अꣳहसस्पतये। अꣳहसःपतय इत्यꣳहसःऽपतये। त्वा॥३०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
देवश्रवा प्रभु का आराधन करता हुआ कहता है कि— १. हे प्रभो! आप ( उपयामगृहीतः असि ) = उपासना के द्वारा धारित यम-नियमों से ग्रहण किये जाते हैं। जो व्यक्ति जीवन में यम-नियमों का पालन करता है, उसी को आप प्राप्त होते हैं। ( मधवे त्वा ) = मैं मधुमास के लिए आपका स्वीकार करता हूँ। वर्ष को प्रारम्भ करनेवाले चैत्र मास में मैं आपको हृदाकाश में बिठाने का प्रयत्न करता हूँ। इस मधुमास में आपको स्वीकार करते हुए मैं सचमुच ( मधु ) = माधुर्य को प्राप्त करता हूँ। मेरा जीवन माधुर्यमय बनता है। 

२. हे प्रभो! आप ( उपयामगृहीतः असि ) = उपासना द्वारा धारित यम-नियमों से गृहीत होते हैं। ( माधवाय त्वा ) = मैं वैशाख मास के लिए आपको स्वीकार करता हूँ। आप स्वयं ‘मा-धव’ हैं। आपको प्राप्त करके लक्ष्मी को तो मैं प्राप्त कर ही लूँगा। 

३. ( उपयामगृहीतः असि ) = आप उपयाम से गृहीत होते हैं। ( शुक्राय त्वा ) = ज्येष्ठ मास में हम आपको पाने का व्रत लेते हैं। आपको पाकर हम आपकी भाँति ‘शुक् गतौ’ निरन्तर गतिशील बनते हैं। लक्ष्मीपति बनकर हमें अकर्मण्य व आरामपसन्द थोड़े ही बन जाना है? 

४. ( उपयामगृहीतः असि ) = हे प्रभो! आप उपयामगृहीत हैं। ( शुचये त्वा ) = आपको आषाढ़ मास के लिए स्वीकार करता हूँ। आपको स्वीकार करके मैं सचमुच ‘शुचि’ = पवित्र बनता हूँ। लक्ष्मी का पति बनकर मैं अर्थ के दृष्टिकोण से अपवित्र हृदयवाला नहीं बनता। 

५. ( उपयामगृहीतः असि ) = हे प्रभो! आप उपयामगृहीत हैं। ( नभसे त्वा ) = श्रावण मास के लिए मैं आपको स्वीकार करता हूँ जिससे आपसे मिलकर [ णभ हिंसायाम् ] मैं इन बुराइयों को मूल में ही समाप्त कर सकूँ [ Nip the evil in the bud ]। 

६. ( उपयामगृहीतः असि ) = हे प्रभो! आप उपयामगृहीत हैं। ( नभस्याय त्वा ) = भाद्रपद मास के लिए मैं आपको स्वीकार करता हूँ, [ न भस् = to revile, blame, abuse + य ] मैं गाली देने में ही उत्तम न बना रहूँ। आपका उपासक बनकर किसी से घृणा न करूँ। किसी के दोष न देखूँ। [ न+भस् to eat + य ] अथवा खाने में ही उत्तम न बना रहूँ। पार्थिव भोग मेरे जीवन का लक्ष्य न हो जाएँ। 

७. ( उपयामगृहीतः असि ) = आप उपयामगृहीत हैं। ( इषे त्वा ) = मैं आश्विन मास के लिए आपको स्वीकार करता हूँ, जिससे सदा आपकी प्रेरणा को पाता रहूँ। 

८. ( उपयामगृहीतः असि ) = आप उपयामगृहीत हैं। ( ऊर्जे त्वा ) = कार्त्तिक मास के लिए मैं आपका स्वीकार करता हूँ, जिससे मैं [ ऊर्ज बलप्राणनयोः ] बल और प्राणशक्ति प्राप्त का सकूँ। 

९. ( उपयामगृहीतः असि ) = आप सुनियमों से स्वीकृत होते हो। ( सहसे त्वा ) = मैं मार्गशीर्ष मास के लिए आपको स्वीकार करता हूँ, जिससे मेरे अन्दर ( सहस् ) = सहनशक्ति [ toleration ] हो। 

१०. ( उपयामगृहीतः असि ) = हे प्रभो! आप सुनियमों से स्वीकृत हो ( सहस्याय त्वा ) = हम पौष मास के लिए आपको स्वीकार करते हैं, इसलिए कि हम [ सहसि साधुः ] उत्तम बलवाले हो सकें। 

११. ( उपयामगृहीतः असि ) = हे प्रभो! आप सुनियमों से स्वीकार किये जाते हो। ( तपसे त्वा ) = माघ मास के लिए हम आपको स्वीकार करते हैं, जिससे हमारा जीवन तपस्वी हो। 

१२. ( उपयामगृहीतः असि ) = आप उपयामगृहीत हो। ( तपस्याय त्वा ) = फाल्गुन मास के लिए हम आपको स्वीकार करते हैं, जिससे हमारा जीवन सुनियम में स्थित हो। [ तपस्या नियमस्थितिः ] हम सदा मर्यादा में चलनेवाले हों। 

१३. ( उपयामगृहीतः असि ) = आप उपयामगृहीत हो। ( अहंसस्पतये त्वा ) = इस तेरहवें मलमास के लिए भी हम आपको ही स्वीकार करते हैं, जिससे हम अंहस् पापों से अपनी रक्षा [ पति ] कर सकें। आपका स्मरण हमें सदा पापों से बचानेवाला हो।
Essence
भावार्थ — यदि हम देवश्रवाः = दिव्य गुणों के कारण कीर्तिवाले बनना चाहते हैं तो हम वर्ष के सभी मासों में प्रभु का स्मरण करनेवाले बनें। यह स्मरण हमें दिव्य गुणों को धारण करनेवाला बनाएगा। हमारे जीवन में ‘माधुर्य, लक्ष्मी, क्रियाशीलता, शुचिता, असुर-संहार, अपशब्दराहित्य, प्रभु-प्रेरणा श्रवण, बल व प्राणशक्ति, सहनशक्ति, उत्तम बल, तप, मर्यादा व पापदूरीकरण का निवास होगा।
Subject
बारह मास प्रभु-चिन्तन