Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 29

48 Mantra
7/29
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- देवश्रवा ऋषिः Chhand- आर्ची पङ्क्ति,भूरिक् साम्नी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
को॑ऽसि कत॒मोऽसि॒ कस्या॑सि॒ को नामा॑सि। यस्य॑ ते॒ नामाम॑न्महि॒ यं त्वा॒ सोमे॒नाती॑तृपाम। भूर्भुवः॒ स्वः सुप्र॒जाः प्र॒जाभिः॑ स्या सु॒वीरो॑ वी॒रैः सु॒पोषः॒ पोषैः॑॥२९॥

कः। अ॒सि॒। क॒त॒मः। अ॒सि॒। कस्य॑। अ॒सि॒। कः। नाम॑। अ॒सि॒। यस्य॑। ते॒। नाम॑। अम॑न्महि। यम्। त्वा॒। सोमे॑न। अती॑तृपाम। भूरिति॒ भूः। भुव॒रिति॑ भु॒वः। स्व॒रिति॒ स्वः॑। सु॒प्र॒जा इति॑ सुऽप्र॒जाः। प्र॒जाभि॒रिति॑ प्र॒ऽजाभिः॑। स्या॒म्। सु॒वीर॒ इति॑ सु॒ऽवीरः॑। वी॒रैः। सु॒पोष॒ इति॑ सु॒ऽपोषः॑। पोषैः॑ ॥२९॥

Mantra without Swara
को सि कतमोसि कस्यासि को नामासि । यस्य ते नामामन्महि यन्त्वा सोमेनातीतृपाम । भूर्भुवः स्वः सुप्रजाः प्रजाभिः स्याँ सुवीरो वीरैः सुपोषः पोषैः ॥

कः। असि। कतमः। असि। कस्य। असि। कः। नाम। असि। यस्य। ते। नाम। अमन्महि। यम्। त्वा। सोमेन। अतीतृपाम। भूरिति भूः। भुवरिति भुवः। स्वरिति स्वः। सुप्रजा इति सुऽप्रजाः। प्रजाभिरिति प्रऽजाभिः। स्याम्। सुवीर इति सुऽवीरः। वीरैः। सुपोष इति सुऽपोषः। पोषैः॥२९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. सोम के महत्त्व को समझता हुआ ‘देवश्रवाः’ प्रभु-स्मरण को सोमरक्षा का प्रमुख साधन जानकर प्रभु की आराधना करता है कि ( कः असि ) = हे प्रभो! आप आनन्दमय हो ( क-तमः असि ) = अत्यन्त आनन्दमय हो। 

२. ( कस्य असि ) = आप आनन्दमय के हो, अर्थात् आप उसे ही प्राप्त होते हो जो अपनी चित्तवृत्तियों को वशीभूत करके सदा प्रसन्न रहता है। 

३. ( को नाम असि ) = हे प्रभो! आप ‘क’ अर्थात् आनन्दमय नामवाले हो। ( यस्य ते ) = जिन आपके ( नाम ) = नाम का ( अमन्महि ) = हम सदा चिन्तन करते हैं। 

४. हे प्रभो! आप वे हैं ( यं त्वा ) = जिन आपको ( सोमेन ) = सोम के द्वारा ( अतीतृपाम ) = हम प्रीणित करते हैं। प्रभु ने हमें सोम ही सर्वोत्तम वस्तु प्राप्त करायी है। यह सोम हमारे जीवनों को आनन्दमय व उल्लासमय बनाता है और हम उस आनन्दमय प्रभु के अधिक समीप पहुँच जाते हैं।

 ५. हे प्रभो! इस सोमरक्षा के द्वारा ( भूः ) = मैं स्वस्थ बनूँ, ( भुवः ) = मैं ज्ञानी बनूँ, ( स्वः ) = मैं जितेन्द्रिय—‘स्वयं राजमान’ होऊँ। ( प्रजाभिः ) = प्रजाओं से मैं ( सुप्रजाः स्याम् ) = उत्तम प्रजाओंवाला होऊँ। ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले पति-पत्नी उत्तम सन्तान प्राप्त करते हैं। ( वीरैः ) = वीरों से मैं ( सुवीरः ) = उत्तम वीरोंवाला बनूँ। ( पोषैः ) = धनों के पोषण से ( सुपोषः ) = उत्तम पोषणवाला होऊँ, अर्थात् मेरी सन्तान उत्तम हो, मैं स्वयं वीर होऊँ और मेरा धन उत्तम उपायों से कमाया जाए।
Essence
भावार्थ — आनन्दमय प्रभु की उपासना हम ‘मनःप्रसाद’ को सिद्ध करके ही कर सकते हैं। प्रभु-उपासन से सोमरक्षा होती है। सोमरक्षा से प्रभु का प्रीणन होता है। हम स्वस्थ, ज्ञानी व जितेन्द्रिय बनते हैं। उत्तम प्रजावाले, वीर व उत्तम धनोंवाले होते हैं।
Subject
देवश्रवा का प्रभुस्तवन