Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 28

48 Mantra
7/28
Devata- यज्ञपतिर्देवता देवता Rishi- देवश्रवा ऋषिः Chhand- ब्राह्मी बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ॒त्मने॑ मे वर्चो॒दा वर्च॑से पव॒स्वौज॑से मे वर्चो॒दा वर्च॑से पव॒स्वायु॑षे मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्व॒ विश्वा॑भ्यो मे प्र॒जाभ्यो॑ वर्चो॒दसौ॒ वर्च॑से पवेथाम्॥२८॥

आ॒त्मने॑। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। ओज॑से। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। आयु॑षे। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। विश्वा॑भ्यः। मे॒। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒ऽजाभ्यः॑। व॒र्चो॒दसा॒विति॑ वर्चः॒ऽदसौ॑। वर्च॑से। प॒वे॒था॒म् ॥२८॥

Mantra without Swara
आत्मने मे वर्चादा वर्चसे पवस्वौजसे मे वर्चादा वर्चसे पवस्वायुषे मे वर्चादा वर्चसे पवस्व विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चादसौ वर्चसे पवेथाम् ॥

आत्मने। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। ओजसे। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। आयुषे। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। विश्वाभ्यः। मे। प्रजाभ्य इति प्रऽजाभ्यः। वर्चोदसाविति वर्चःऽदसौ। वर्चसे। पवेथाम्॥२८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे सोम! ( मे आत्मने ) = मेरे मन के लिए तू ( वर्चोदाः ) = वर्चस् देनेवाला है। तू ( वर्चसे ) = मन की शक्ति के लिए ( पवस्व ) = मुझे प्राप्त हो। 

२. ( मे ओजसे ) = मेरे ओजस्तत्त्व के लिए, शरीर की वृद्धि के कारणभूत तत्त्व के लिए ( वर्चोदाः ) = तू वर्चस् को देनेवाला है। ( वर्चसे ) = इस ओजस्तत्त्व को शक्तिशाली बनाने के लिए तू ( पवस्व ) = मुझे प्राप्त हो अथवा मुझे पवित्र कर। 

३. ( मे आयुषे ) = मेरे जीवन के लिए तू ( वर्चोदाः ) = वर्चस् देनेवाला है। ( वर्चसे ) = मेरे जीवन को शक्ति-सम्पन्न बनाने के लिए ( पवस्व ) = तू मुझे प्राप्त हो। 

४. ( मे ) = मेरी ( विश्वाभ्यः ) = सब ( प्रजाभ्यः ) = विकास-शक्तियों के लिए ( वर्चोदसौ ) = तुम वर्चस् देनेवाले हो। ( वर्चसे ) = इस मेरे वर्चस् के लिए ( पवेथाम् ) = मुझे प्राप्त होओ या पवित्र करो।
Essence
भावार्थ — सोम की रक्षा से मन बलवान् होता है, शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्गों को बढ़ानेवाली शक्ति पुष्ट होती है, जीवन स्फूर्तिमय बनता है और सब शक्तियों का विकास होता है। शारीरिक, मानस व बौद्धिक-विकास का मूल यह सोम ही है।
Subject
सर्वांगीण विकास