Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 27

48 Mantra
7/27
Devata- यज्ञपतिर्देवता देवता Rishi- देवश्रवा ऋषिः Chhand- आसुरी अनुष्टुप्,आसुरी उष्णिक्,साम्नी गायत्री,आसुरी गायत्री Swara- ऋषभः, षड्जः
Mantra with Swara
प्रा॒णाय॑ मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्व व्या॒नाय॑ मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वोदा॒नाय॑ मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्व वा॒चे मे॑ वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्व॒ क्रतू॒दक्षा॑भ्यां मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्व॒ श्रोत्रा॑य मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्व॒ चक्षु॑र्भ्यां मे वर्चो॒दसौ॒ वर्च॑से पवेथाम्॥२७॥

प्रा॒णाय॑। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। व्या॒नायेति॑ विऽआ॒नाय॑। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। उ॒दा॒नायेत्यु॑त्ऽआ॒नाय॑। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्च॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। वा॒चे। मे॒। व॒र्चो॒दा इति वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। क्रतू॒दक्षा॑भ्याम्। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। श्रोत्रा॑य। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। चक्षु॑र्भ्या॒मिति॒ चक्षुः॑ऽभ्याम्। मे॒। व॒र्चो॒दसा॒विति॑ वर्चः॒ऽदसौ॑। वर्च॑से। प॒वे॒था॒म् ॥२७॥

Mantra without Swara
प्राणाय मे वर्चादा वर्चसे पवस्व व्यानाय मे वर्चादा वर्चसे पवस्व उदानाय मे वर्चादा वर्चसे पवस्व वाचे मे वर्चादा वर्चसे पवस्व क्रतूदक्षाभ्याम्मे वर्चादा वर्चसे पवस्व श्रोत्राय मे वर्चादा वर्चसे पवस्व चक्षुर्भ्याम्मे वर्चादसौ वर्चसे पवेथाम् ॥

प्राणाय। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। व्यानायेति विऽआनाय। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। उदानायेत्युत्ऽआनाय। मे। वर्चोदा इति वर्चऽदाः। वर्चसे। पवस्व। वाचे। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। क्रतूदक्षाभ्याम्। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। श्रोत्राय। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। चक्षुर्भ्यामिति चक्षुःऽभ्याम्। मे। वर्चोदसाविति वर्चःऽदसौ। वर्चसे। पवेथाम्॥२७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र के ‘देवानामुत्क्रमणमसि’ का ही व्याख्यान २७ व २८ मन्त्र में करते हैं। देवश्रवाः सोम को सम्बोधित करते हुए कहता है कि १. हे सोम! ( मे प्राणाय ) = मेरे प्राणों के लिए तू ( वर्चोदाः ) = वर्चस् देनेवाला है, अतः ( वर्चसे ) = प्राणशक्ति के लिए तू मुझे ( पवस्व ) =  प्राप्त हो। 

२. ( मे व्यानाय ) = मेरी व्यानवायु के लिए तू ( वर्चोदाः ) = वर्चस् देनेवाला है। ( वर्चसे ) =  व्यान की शक्ति के लिए तू ( पवस्व ) = मुझे प्राप्त हो। व्यानवायु ही सारे शरीर में गति करती हुई सब संस्थानों के कार्यों को ठीक प्रकार से चलाती है। 

३. ( मे उदानाय ) = मेरे कण्ठदेश में काम करनेवाले उदानवायु के लिए तू ( वर्चोदाः ) = वर्चस् देनेवाला है। ( वर्चसे ) = उदान की शक्ति के लिए तू मुझे ( पवस्व ) = प्राप्त हो। 

४. ( मे वाचे ) = मेरी वाणी के लिए तू ( वर्चोदाः ) = वर्चस् देनेवाला है। ( वर्चसे ) = मेरी वाक्शक्ति के लिए तू ( पवस्व ) = मुझे प्राप्त हो। 

५. ( मे क्रतुदक्षाभ्याम् ) =  [ प्रज्ञाबलाभ्याम्—द० ] मेरी प्रज्ञा व मेरे बल के लिए ( वर्चोदाः ) = तू वर्चस् देनेवाला है। ( वर्चसे ) = मेरी प्रज्ञाशक्ति के लिए तथा शारीरिक शक्ति के लिए तू ( पवस्व ) = मुझे प्राप्त हो। 

६. ( मे श्रोत्राय ) = मेरे कान के लिए ( वर्चोदाः ) = तू शक्ति देनेवाला है। ( वर्चसे ) = श्रोत्रशक्ति के लिए तू ( पवस्व ) = मुझे प्राप्त हो। 

७. ( मे चक्षुर्भ्याम् ) = मेरी आँखों के लिए तुम ( वर्चोदसौ ) = शक्ति को देनेवाले हो। ( वर्चसे ) = दृष्टिशक्ति के लिए ( पवेथाम् ) = मुझे प्राप्त होओ अथवा पवित्र करो। यहाँ सारे मन्त्र में इस अन्तिम वाक्य में ही ‘वर्चोदसौ’ यह द्विवचन का प्रयोग है, क्योंकि ‘चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ’ इस वाक्य के अनुसार आँखों में चन्द्र व सूर्यशक्ति का निवास है। इस शक्तिद्वय के कारण यहाँ द्विवचन है। सूर्य यदि ‘तेजस्’ का प्रतीक है तो चन्द्र ‘प्रसाद’ का। आँखों में तेजस्विता व प्रसाद दोनों ही होने चाहिएँ। इसी दृष्टिकोण से द्विवचन है।
Essence
भावार्थ — सोम ‘प्राण-व्यान-उदान-वाणी-प्रज्ञा और बल-श्रोत्र व चक्षु’ को वर्चस् प्राप्त करानेवाला है।
Subject
वर्चस्