Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 21

48 Mantra
7/21
Devata- सोमो देवता Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- स्वराट् ब्राह्मी त्रिष्टुप्,याजुषी जगती Swara- धैवतः, निषादः
Mantra with Swara
सोमः॑ पवते॒ सोमः॑ पवते॒ऽस्मै ब्रह्म॑णे॒ऽस्मै क्ष॒त्राया॒स्मै सु॑न्व॒ते यज॑मानाय पवतऽइ॒षऽऊ॒र्जे प॑वते॒ऽद्भ्यऽओष॑धीभ्यः पवते॒ द्यावा॑पृथि॒वाभ्यां॑ पवते सुभू॒ताय॑ पवते॒ विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॑ऽए॒ष ते॒ योनि॒र्विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्यः॑॥२१॥

सोमः॑। प॒व॒ते॒। सोमः॑। प॒व॒ते॒। अ॒स्मै। ब्रह्म॑णे। अ॒स्मै। क्ष॒त्राय॑। अ॒स्मै। सु॒न्व॒ते। यज॑मानाय। प॒व॒ते॒। इ॒षे। ऊ॒र्ज्जे। प॒व॒ते॒। अ॒द्भ्यऽइत्य॒त्ऽभ्यः। ओष॑धीभ्यः। प॒व॒ते॒। द्यावा॑पृथि॒वीभ्या॑म्। प॒व॒ते॒। सु॒भूतायेति॑ सुऽभू॒ताय॑। प॒व॒ते॒। विश्वे॑भ्यः। त्वा॒। दे॒वेभ्यः॑। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। विश्वे॑भ्यः। त्वा॒। दे॒वेभ्यः॑ ॥२१॥

Mantra without Swara
सोमः पवते सोमः पवतेस्मै ब्रह्मणेस्मै क्षत्रायास्मै सुन्वते यजमानाय पवतऽइष ऊर्जे पवतेद्भ्य ओषधीभ्यः पवते द्यावापृथिवीभ्याम्पवते सुभूताय पवते विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यऽएष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः ॥

सोमः। पवते। सोमः। पवते। अस्मै। ब्रह्मणे। अस्मै। क्षत्राय। अस्मै। सुन्वते। यजमानाय। पवते। इषे। ऊर्ज्जे। पवते। अद्भ्यऽइत्यत्ऽभ्यः। ओषधीभ्यः। पवते। द्यावापृथिवीभ्याम्। पवते। सुभूतायेति सुऽभूताय। पवते। विश्वेभ्यः। त्वा। देवेभ्यः। एषः। ते। योनिः। विश्वेभ्यः। त्वा। देवेभ्यः॥२१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की मुख्य भावना यह है कि प्रभु ही सब यज्ञों के पति हैं। वस्तुतः जीव से समय-समय पर किये जानेवाले सब यज्ञों को करने की शक्ति उसे प्रभु ही देते हैं। प्रभु ने हमारे शरीरों में सोम-निर्माण की व्यवस्था की है। यह ( सोमः ) = सोम ( पवते ) = हमारे जीवनों को पवित्र करता है। इस वीर्य के द्वारा शरीर नीरोग रहता है, मन बुराइयों से बचा रहता है और मस्तिष्क दीप्त ज्ञानाग्निवाला बनता है। एवं, सोम शरीर, मन व मस्तिष्क सभी को पवित्र बनाता है। 

२. ( अस्मै ब्रह्मणे ) = इस ज्ञान के लिए ( सोमः ) = सोम ( पवते ) = हमें पवित्र करता है, ( अस्मै क्षत्राय ) = इन क्षतों से त्राण करनेवाले, रोगों के आघातों से बचानेवाले, बल के लिए यह सोम हमें पवित्र करता है तथा ( अस्मै सुन्वते यजमानाय ) = इस ऐश्वर्य का सम्पादन करनेवाले [ सुवानाय ] यजमान के लिए यह सोम हमें पवित्र करता है। इस सोम की रक्षा से जहाँ हम ऐश्वर्य कमाने की योग्यतावाले होते हैं, वहाँ उसका यज्ञों में विनियोग करने की रुचिवाले होते हैं। 

३. यह सोम ( पवते ) = हममें गति करता हुआ हमारे जीवनों को पवित्र बनाता है, जिससे ( इषे ) = हम प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाले बनें और ( ऊर्जे ) = बल तथा प्राणशक्ति से युक्त होकर उस प्रेरणा को क्रियारूप में ला सकें।

४. यह सोम हमारे अन्दर ( अद्भ्यः ) = जलों से तथा ( ओषधीभ्यः ) = वनस्पतियों से ही ( पवते ) = पवित्रता का सञ्चार करता है। जलों व वनस्पतियों से उत्पन्न वीर्य ही सात्त्विक वीर्य है। वही हमारे जीवनों को पवित्र करता है। मांसाहार से उत्पन्न वीर्य इस पवित्रता का साधक नहीं होता। इसे वेद में ‘उष्णं वाः’ = उष्ण वीर्य कहा गया है और इसका शरीर में सुरक्षित होना सुगम नहीं है। 

५. यह जलों व ओषधियों से उत्पन्न सोम ( द्यावापृथिवीभ्याम् ) = हमारे मस्तिष्करूप द्युलोक को ज्योतिर्मय तथा शरीररूप पृथिवी को दृढ़ बनाने के लिए ( पवते ) = हममें गति करता है। 

६. इस प्रकार ( सुभूताय ) = यह सोम उत्तम स्थिति के लिए अथवा उत्तम ऐश्वर्य के लिए ( पवते ) = हममें गति करता है। 

७. ठीक-ठीक बात यह है कि यह सोम ( विश्वेभ्यः देवेभ्यः ) = सब दिव्य गुणों के लिए ( त्वा ) = तुझे ( पवते ) = पवित्र कर देता है। 

८. ( एषः ते योनिः ) = यह सोम ही तेरी सब उन्नतियों का कारण है। यही ( त्वा ) = तुझे ( विश्वेभ्यः देवभ्यः ) = सब दिव्य गुण प्राप्त कराता है।
Essence
भावार्थ — शरीर के अन्दर जलों व ओषधियों से उत्पन्न वीर्य ‘ज्ञान-बल-ऐश्वर्य’ को बढ़ानेवाला होता है। यह शरीर व मस्तिष्क दोनों को सुन्दर बनाता हुआ सब दिव्य गुणों को प्राप्त कराता है।
Subject
पवित्रता