Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 18

48 Mantra
7/18
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप्,प्राजापत्या गायत्री Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒प्र॒जाः प्र॒जाः प्र॑ज॒नय॒न् परी॑ह्य॒भि रा॒यस्पोषे॑ण॒ यज॑मानम्। स॒ञ्ज॒ग्मा॒नो दि॒वा पृ॑थि॒व्या म॒न्थी म॒न्थिशो॑चिषा॒ निर॑स्तो॒ मर्को॑ म॒न्थिनो॑ऽधि॒ष्ठान॑मसि॥१८॥

सु॒प्र॒जा इति॑ सुऽप्र॒जाः। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। प्र॒ज॒नयन्निति॑ प्रऽज॒नय॑न्। परि॑। इ॒हि॒। अ॒भि। रा॒यः। पोषे॑ण। यज॑मानम्। स॒ञ्ज॒ग्मा॒न इति॑ सम्ऽजग्मा॒नः। दि॒वा। पृ॒थि॒व्या। म॒न्थी। म॒न्थिशो॑चि॒षेति॑ म॒न्थिशो॑चिषा। निर॑स्त॒ इति॑ निःऽअ॑स्तः। मर्कः॑। म॒न्थिनः॑। अ॒धि॒ष्ठान॑म्। अ॒धि॒स्थान॒मित्य॑धि॒ऽस्थान॑म्। अ॒सि॒ ॥१८॥

Mantra without Swara
सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन्परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम् । सञ्जग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा निरस्तो मर्को मन्थिनो धिष्ठानमसि ॥

सुप्रजा इति सुऽप्रजाः। प्रजा इति प्रऽजाः। प्रजनयन्निति प्रऽजनयन्। परि। इहि। अभि। रायः। पोषेण। यजमानम्। सञ्जग्मान इति सम्ऽजग्मानः। दिवा। पृथिव्या। मन्थी। मन्थिशोचिषेति मन्थिशोचिषा। निरस्त इति निःऽअस्तः। मर्कः। मन्थिनः। अधिष्ठानम्। अधिस्थानमित्यधिऽस्थानम्। असि॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र का मनोविजेता ( सुप्रजाः ) = उत्तम प्रजाओंवाला होता है। यह ( प्रजाः ) = प्रजाओं को ( प्रजनयन् ) = विकसित करनेवाला होता है। 

२. यह ( यजमानम् ) = इस सृष्टि-यज्ञ को रचनेवाले प्रभु को ( अभिरायस्पोषेण ) = आन्तर व बाह्य सम्पत्ति के पोषण से ( परीहि ) = प्राप्त होता है। प्रभु की प्राप्ति का उपाय यही है कि मनुष्य बाह्य सम्पत्ति, अर्थात् शरीर के स्वास्थ्य का सम्पादन करे और साथ ही आन्तर सम्पत्ति पवित्रता व ज्ञान को सिद्ध करे। ‘स्वस्थ, पवित्र व ज्ञानी’ पुरुष ही प्रभु-प्राप्ति का अधिकारी होता है। 

३. ( दिवा ) = ज्ञान की ज्योति से तथा ( पृथिव्या ) = विस्तृत शक्तियोंवाले शरीर से ( संजग्मानः ) = सङ्गत हुआ-हुआ तू ( मन्थी ) = शत्रुओं का मथन करनेवाला होता है। 

४. ( मन्थिशोचिषा ) = रोगकृमियों का मथन करनेवाले सोम की दीप्ति से ( मर्कः ) = यह देह ( निरस्तः ) = [ अपमृष्टः ] सब दोषों को दूर फेंकनेवाला होता है [ असु क्षेपणे ]। ५. हे सुप्रजाः! तू इसी दृष्टिकोण से ( मन्थिनः ) = सोम का ( अधिष्ठानम् असि ) = अधिष्ठान बनता है। वस्तुतः ‘सुप्रजाः’ का ‘सुप्रजास्त्व’ इस सोम के कारण ही है। १३ वें मन्त्र में इसे ही ‘सुवीर’ शब्द से स्मरण किया गया था। वहाँ सोम के लिए ‘शुक्र’ शब्द का प्रयोग था।

 
Essence
भावार्थ — वीर्यरक्षा से मनुष्य ‘सुप्रजाः’ होता है, स्वस्थ व ज्ञानी बनकर प्रभु को प्राप्त करनेवाला होता है, निर्दोष शरीरवाला बनता है।
Subject
सु-प्रजाः