Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 17

48 Mantra
7/17
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- स्वराट् ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मनो॒ न येषु॒ हव॑नेषु ति॒ग्मं विपः॒ शच्या॑ वनु॒थो द्र॑वन्ता। आ यः शर्या॑भिस्तुविनृ॒म्णोऽ अ॒स्याश्री॑णीता॒दिशं॒ गभ॑स्तावे॒ष ते॒ योनिः॑ प्र॒जाः पा॒ह्यप॑मृष्टो॒ मर्को॑ दे॒वास्त्वा॑ मन्थि॒पाः प्रण॑य॒न्त्वना॑धृष्टासि॥१७॥

मनः॑। न। येषु॑। हव॑नेषु। ति॒ग्मम्। विपः॑। शच्या॑। व॒नु॒थः। द्र॑वन्ता। आ। यः। शर्य्या॑भिः। तुवि॒नृम्ण इति॑ तुविऽनृ॒म्णः। अ॒स्य॒। अश्री॑णीत। आ॒दिश॒मित्या॒ऽदिश॑म्। गभ॑स्तौ। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। पा॒हि॒। अप॑मृष्ट॒ इत्यप॑ऽमृष्टः। मर्कः॑। दे॒वाः। त्वा॒। म॒न्थि॒पा इति॑ मन्थि॒ऽपाः। प्र। न॒य॒न्तु॒। अना॑धृष्टा। अ॒सि॒ ॥१७॥

Mantra without Swara
मनो न येषु हवनेषु तिग्मँ विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता । आ यः शर्याबिस्तुविनृम्णो अस्याश्रीणीतादिशङ्गभस्तावेष ते योनिः प्रजाः पाह्यपमृष्टो मर्का देवास्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्त्वनाधृष्टासि ॥

मनः। न। येषु। हवनेषु। तिग्मम्। विपः। शच्या। वनुथः। द्रवन्ता। आ। यः। शर्य्याभिः। तुविनृम्ण इति तुविऽनृम्णः। अस्य। अश्रीणीत। आदिशमित्याऽदिशम्। गभस्तौ। एषः। ते। योनिः। प्रजा इति प्रऽजाः। पाहि। अपमृष्ट इत्यपऽमृष्टः। मर्कः। देवाः। त्वा। मन्थिपा इति मन्थिऽपाः। प्र। नयन्तु। अनाधृष्टा। असि॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में प्रभु की उपासना के द्वारा वेन अपने जीवन को अत्यन्त सुन्दर बनाने का निश्चय करता है। ‘इन प्रभु-उपासनाओं से क्या होता है?’ यह बात प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि ( येषु हवनेषु ) = जिन प्रभु के पुकारने के समयों पर अथवा प्रभु के प्रति अपना अर्पण करने के अवसरों पर ( विपः ) = मेधावी पति-पत्नी ( मनः ) = अपने मन को, जो मन ( न तिग्मम् ) = तेज़ नहीं है, अर्थात् जो शान्त है, उसे ( शच्या ) = प्रज्ञापूर्वक ( द्रवन्ता ) = गति करते हुए ( वनुथः ) = जीतते हैं। 

२. उपासना से मन शान्त होता है, मनुष्य सब क्रियाओं को बुद्धिमत्तापूर्वक करता है, अन्त में मन को पूर्णरूप से जीत लेता है। यह मनोविजेता वह है ( यः ) = जो ( आशर्याभिः ) = [ शॄ हिंसायाम् ] सब बुराइयों की हिंसा के द्वारा ( तुविनृम्णः ) = महान् बलवाला है। ( अस्य ) = इसकी ( गभस्तौ ) = ज्ञान-किरणों में ( आदिशम् ) = [ दिशायाम् दिशायाम् ] प्रत्येक दिशा में ( आश्रीणीत ) = अपने को परिपक्व करो। जिसने स्वयं मन को जीता है, उसके अनुभवों से पूर्ण लाभ लेते हुए अन्य लोग भी अपनी शक्तियों का परिपाक करें। 

३. ( एषः ते योनिः ) = हे सोम! जिस तेरी रक्षा पर ही सब उन्नतियाँ निर्भर करती हैं, उस तेरा यह शरीर ही घर है। इस शरीर में ही व्यापक होकर तूने रहना है। 

४. शरीर में रहकर ( प्रजाः पाहि ) = सब प्रजाओं का तू पालन कर। तेरे निवास से ही यह ( मर्कः ) = शरीर ( अपमृष्टः ) = बुराइयों के सुदूर विध्वंस के द्वारा शुद्ध कर दिया जाता है। 

५. इसीलिए ( मन्थिपाः ) = सोम की रक्षा करनेवाले ( देवाः ) =  देव ( त्वा ) = तुझे ( प्रणयन्तु ) = शरीर में विशेष रूप से प्राप्त कराएँ। हे शुक्रशक्ते! तू ( अनाधृष्ट असि ) = अपराजेय है। तेरे होने पर शरीर में किसी रोगादि का आक्रमण नहीं होता।
Essence
भावार्थ — प्रभु-उपासना से मन शान्त होता है। जीवन शुद्ध होता है। यह शुक्रशक्ति अपराजेय है। इसकी रक्षा से ही शरीर निर्दोष होता है।
Subject
मनो विजय