Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 16

48 Mantra
7/16
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्,साम्नी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒यं वे॒नश्चो॑दय॒त् पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒माने॑। इ॒मम॒पा स॑ङ्ग॒मे सूर्य॑स्य॒ शिशुं॒ न विप्रा॑ म॒तिभी॑ रिहन्ति। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ मर्का॑य त्वा॥१६॥

अ॒यम्। वे॒नः। चो॒द॒य॒त्। पृश्नि॑गर्भा॒ इति॒ पृश्नि॑ऽगर्भाः। ज्योति॑र्जरायु॒रिति॒ ज्योतिः॑ऽजरायुः। रज॑सः। वि॒मान॒ इति॑ वि॒ऽमाने॑। इ॒मम। अ॒पाम्। स॒ङ्ग॒म इति॑ सम्ऽग॒मे। सूर्य्य॑स्य। शिशु॑म्। न। विप्राः॑। म॒तिभि॒रिति॑ म॒तिऽभिः॑। रि॒ह॒न्ति॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। मर्का॑य। त्वा॒ ॥१६॥

Mantra without Swara
अयँवेनश्चोदयत्पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इममपाँ सङ्गमे सूर्यस्य शिशुन्न विप्रा मतिभी रिहन्ति । उपयामगृहीतोसि मर्काय त्वा ॥

अयम्। वेनः। चोदयत्। पृश्निगर्भा इति पृश्निऽगर्भाः। ज्योतिर्जरायुरिति ज्योतिःऽजरायुः। रजसः। विमान इति विऽमाने। इमम। अपाम्। सङ्गम इति सम्ऽगमे। सूर्य्यस्य। शिशुम्। न। विप्राः। मतिभिरिति मतिऽभिः। रिहन्ति। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। मर्काय। त्वा॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( अयम् ) = गत मन्त्र में वर्णित मधुर वाणियोंवाला यह व्यक्ति ही ( वेनः ) = मेधावी है [ नि० ३।१५ ]। यह ( पृश्निगर्भाः ) = [ पृश्निः आदित्यो गर्भे येषाम् ] आदित्य के समान ज्योति है गर्भ में जिनके, अर्थात् ज्ञान से परिपूर्ण वाणियों को ( चोदयत् ) = प्रेरित करता है, अर्थात् इसकी वाणियाँ सदा ज्ञान के प्रकाशवाली होती हैं। 

२. यह ( रजसो विमाने ) = रजोगुण के विशिष्ट रूप से निर्माण के निमित्त ( ज्योतिर्जरायुः ) = ज्योतिरूप वेष्टन व आच्छादनवाला होता है। यह ज्ञान को अपना आवरण बनाता है और परिणामतः रजोगुण को विशिष्ट परिमाण में अपने अन्दर विकसित होने देता है। ज्ञान के कारण इसका रजोगुण उच्छृंखल न होकर सदा नियन्त्रित होता है। 

३. ( इमम् ) = इस वेन [ मेधावी ] को ( अपाम् ) = जलों, ( सूर्यस्य ) = सूर्य व तेज का ( सङ्गमे ) = सङ्गम होने पर, अर्थात् शान्ति [ = जल ] व शक्ति [ = सूर्य-तेज ] का समन्वय होने पर ( शिशुं न ) = शिशु के समान अर्थात् पुत्रवत् प्रेम करते हुए ( विप्राः ) = ज्ञानी लोग ( मतिभिः ) = ज्ञानों से ( रिहन्ति ) = सत्कृत करते हैं [ रिहन्तीत्यर्चतिकर्मसु—नि० ३।१४ ], अर्थात् शान्ति व शक्ति का अपने में समन्वय करनेवाले इस मेधावी को जो ( शिशुं न ) = एक अबोध बालक के समान निर्दोष है, ज्ञानी लोग प्रेम से ज्ञान देते हैं। आचार्यों का विद्यार्थी को ज्ञान देना ही अर्चन है। 

४. ( उपयामगृहीतः असि ) = हे वेन! तू उपयामगृहीत है, प्रभु की उपासना द्वारा यम-नियमों से युक्त है। ( मर्काय त्वा ) = [ मर्च गतौ ] मैं तुझे गतिशीलता के लिए प्रेरित करता हूँ। यह गतिशीलता ही तुझे पवित्र बनाएगी और तू प्रभु का उपासक बनकर यम-नियमों का पालन करनेवाला हो सकेगा।
Essence
भावार्थ — मेधावी पुरुष ज्ञान को अपना आच्छादन बनाता है। यह अपने जीवन में शान्ति व शक्ति का मिश्रण करता है। ज्ञानी इसे प्रेम से ज्ञान प्राप्त कराते हैं और यह गतिशील बनकर प्रभु का उपासक होता हुआ यम-नियमों का पालन करता है।
Subject
शक्ति व शान्ति का समन्वय