Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 15

48 Mantra
7/15
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- निचृत् ब्राह्मी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स प्र॑थ॒मो बृह॒स्पति॑श्चिकि॒त्वाँस्तस्मा॒ऽइन्द्रा॑य सु॒तमाजु॑होत॒ स्वाहा॑। तृ॒म्पन्तु॒ होत्रा॒ मध्वो॒ याः स्वि॑ष्टा॒ याः सुप्री॑ताः॒ सुहु॑ता॒ यत्स्वाहाया॑ड॒ग्नीत्॥१५॥

सः। प्र॒थ॒मः। बृह॒स्पतिः॑। चि॒कि॒त्वान्। तस्मै॑। इन्द्रा॑य। सु॒तम्। आ। जु॒हो॒त॒। स्वाहा॑। तृ॒म्पन्तु॑। होत्राः॑। मध्वः॑। याः। स्वि॑ष्टा॒ इति॒ सुऽइ॑ष्टाः। याः। सुप्री॑ता॒ इति॒ सुऽप्री॑ताः। सुहु॑ता॒ इति॑ सुऽहु॑ताः। यत्। स्वाहा॑। अया॑ट्। अ॒ग्नीत् ॥१५॥

Mantra without Swara
स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्माऽइन्द्राय सुतमा जुहोत स्वाहा । तृम्पन्तु होत्रा मध्वो याः स्विष्टा याः सुप्रीताः सुहुता यत्स्वाहायाडग्नीत् ॥

सः। प्रथमः। बृहस्पतिः। चिकित्वान्। तस्मै। इन्द्राय। सुतम्। आ। जुहोत। स्वाहा। तृम्पन्तु। होत्राः। मध्वः। याः। स्विष्टा इति सुऽइष्टाः। याः। सुप्रीता इति सुऽप्रीताः। सुहुता इति सुऽहुताः। यत्। स्वाहा। अयाट्। अग्नीत्॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की भावना के अनुसार संस्कृति को अपनानेवाला ( सः ) = वह व्यक्ति ( प्रथमः ) = अपनी सब शक्तियों का विस्तारक होता है। 

२. यह ( बृहस्पतिः ) = बृहती वेदवाणी का पालक बनता है—विद्यायुक्त वाणी का अधिष्ठाता होता है। सर्वोच्च ऊर्ध्वा दिशा का यह अधिपति होता है। 

३. ( चिकित्वान् ) = विज्ञानवान् अथवा ‘कित निवासे रोगापनयने च’ = उत्तम निवासवाला या नीरोग होता है। 

४. हे विश्वेदेवा! तुम ( तस्मा इन्द्राय ) = इस इन्द्रियों के अधिष्ठाता के लिए ( सुतम् ) = ऐश्वर्य को ( आजुहोत ) = सर्वथा दो। ( स्वाहा ) = यही सु+हा = उत्तम त्याग है। देवों का सर्वोत्तम दान यही है कि वे जितेन्द्रिय पुरुष को ऐश्वर्य प्राप्त कराते हैं। 

५. इन इन्द्रवृत्तिवाले लोगों को ( होत्राः ) = वाणियाँ ( तृम्पन्तु ) = तृप्त करें, ( यत् ) = जो वाणियाँ ( मध्वाः ) = माधुर्य से युक्त हैं और ( याः ) = जो ( स्विष्टाः ) = [ सु इष्टाः ] अत्यन्त वाञ्छनीय हैं ( याः ) = जो ( सुप्रीताः ) = [ प्रीञ् तर्पणे ] उत्तम तृप्ति देनेवाली हैं ( सुहुताः ) = जिन वाणियों से उत्तम यज्ञादि कर्म किये जाते हैं। 

६. ( यत् ) = क्योंकि ( अग्नीत् ) = [ अग्निमिन्धे ] अग्नि को समिद्ध करनेवाला व्यक्ति ( स्वाहा ) = उत्तम वाणियों के द्वारा [ सत्यवाणी से—द० ] ( अयाट् ) = यज्ञों को करता है अथवा सभी को सत्कृत करता है [ यज् = देवपूजा ]। ( अग्नीत् ) = अग्नि को समिद्ध करता है, अर्थात् अग्निहोत्रादि कर्मों को करता है तथा प्रभुरूप अग्नि को अपने हृदय में देखने का प्रयत्न करता है। सर्वत्र प्रभु को देखनेवाला यह व्यक्ति सभी के साथ मधुर वाणियों का प्रयोग करता है।
Essence
भावार्थ — प्रभुरूप अग्नि को समिद्ध करनेवाला सदा मधुर वाणी का प्रयोग करता है, मधुर सत्यवाणी से ही सबका सत्कार करता है।
Subject
आग्नीत् की मधुर वाणी