Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 14

48 Mantra
7/14
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- विराट जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
अच्छि॑न्नस्य ते देव सोम सु॒वीर्य॑स्य रा॒यस्पोष॑स्य ददि॒तारः॑ स्याम। सा प्र॑थ॒मा सँस्कृ॑तिर्वि॒श्ववा॑रा॒ स प्र॑थ॒मो वरु॑णो मि॒त्रोऽअ॒ग्निः॥१४॥

अच्छि॑न्नस्य। ते॒। दे॒व॒। सो॒म॒। सु॒वीर्य्य॒स्येति॑ सु॒ऽवीर्य्य॑स्य। रा॒यः। पोष॑स्य। द॒दि॒तारः॑। स्या॒म॒। सा। प्र॒थ॒मा। संस्कृ॑तिः। वि॒श्ववा॒रेति॑ वि॒श्वऽवा॑रा। सः। प्र॒थ॒मः। वरु॑णः। मि॒त्रः। अ॒ग्निः ॥१४॥

Mantra without Swara
अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम । सा प्रथमा सँस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो अग्निः ॥

अच्छिन्नस्य। ते। देव। सोम। सुवीर्य्यस्येति सुऽवीर्य्यस्य। रायः। पोषस्य। ददितारः। स्याम। सा। प्रथमा। संस्कृतिः। विश्ववारेति विश्वऽवारा। सः। प्रथमः। वरुणः। मित्रः। अग्निः॥१४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र का शमादि गुणयुक्त पुरुष प्रार्थना करता हुआ कहता है कि हे ( देव सोम ) = दिव्य गुणों को उत्पन्न करनेवाले सोम! हम ( ते ) = तेरे ( अच्छिन्नस्य ) = कभी विच्छिन्न न होनेवाले ( सुवीर्यस्य ) = उत्तम वीरता से युक्त ( रायस्पोषस्य ) = धन के पोषण के ( ददितारः ) = [ दधितारः ] धारण करनेवाले ( स्याम ) = हों। हम सोम की रक्षा के द्वारा उत्तम शक्ति को प्राप्त करें, उत्तम धनों को धारण करनेवाले बनें। 

३. [ क ] अविच्छिन्नरूप से हम वीर्य को धारण करनेवाले बनें, [ ख ] धनों को प्राप्त करके यज्ञादि उत्तम कार्यों के लिए दान करनेवाले हों। ( सा ) = इन दोनों बातों का पालन करना ही ( प्रथमा ) = प्रमुख अथवा हमारे जीवनों व शक्तियों का विस्तार करनेवाली ( संस्कृतिः ) = संस्कृति [ culture ] है। यह संस्कृति ( विश्ववारा ) = सबसे वरने के योग्य है। सभी को इस संस्कृति को अपनाना चाहिए, अथवा यह ( विश्ववारा ) = सब वरणीय वस्तुओंवाली है। इस संस्कृति से हमारे अन्दर सब इष्ट गुणों की उत्पत्ति होती है। 

४. ( सः ) = वह—इस संस्कृति को अपनानेवाला व्यक्ति ( प्रथमः ) = अपनी सब शक्तियों का विस्तार करता है, अतएव समाज में मुख्य—प्रथम स्थान में स्थित होता है। ( वरुणः ) = यह सब द्वेषों व अन्य बुराइयों का निवारण करनेवाला होता है और इस प्रकार ‘वरुणो नाम वरः श्रेष्ठः’ श्रेष्ठ जीवनवाला होता है। ( मित्रः ) = यह सभी के साथ स्नेह करता है ‘प्रमीतेः त्रायते’ और अपने को पापरूप मृत्युओं से बचाता है, तथा ( अग्निः ) = निरन्तर आगे बढ़नेवाला होता है।
Essence
भावार्थ — सबसे स्वीकार करनेयोग्य संस्कृति यही है कि १. हम अविच्छिन्न वीर्य को धारण करनेवाले बनें, शक्ति की रक्षा करें। २. और दान दिये जानेवाले [ रा दाने ] धन के पोषक हों।
Subject
प्रथमा संस्कृति