Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 13

48 Mantra
7/13
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्,प्राजापत्या गायत्री, Swara- धैवतः, षड्जः
Mantra with Swara
सु॒वीरो॑ वी॒रान् प्र॑ज॒नय॒न् परी॑ह्य॒भि रा॒यस्पोषे॑ण॒ यज॑मानम्। स॒ञ्ज॒ग्मा॒नो दि॒वा पृ॑थि॒व्या शु॒क्रः शु॒क्रशो॑चिषा॒ निर॑स्तः॒ शण्डः॑ शु॒क्रस्या॑धि॒ष्ठान॑मसि॥१३॥

सु॒वीर॒ इति॑ सु॒ऽवीरः॑। वी॒रान्। प्र॒ज॒नय॒न्निति॑ प्रऽज॒नय॑न्। परि॑। इ॒हि॒। अ॒भि। रा॒यः। पोषे॑ण। यज॑मानम्। स॒ञ्ज॒ग्मा॒न इति॑ सम्ऽजग्मा॒नः। दि॒वा। पृ॒थि॒व्या। शु॒क्रः। शु॒क्रशो॑चि॒षेति॑ शु॒क्रऽशो॑चिषा। निर॑स्त॒ इति॒ निःऽअ॑स्तः। शण्डः॑। शु॒क्रस्य॑। अ॒धि॒ष्ठान॑म्। अ॒धि॒स्थान॒मित्य॑धि॒ऽस्थान॑म्। अ॒सि॒ ॥१३॥

Mantra without Swara
सुवीरो वीरान्प्रजनयन्परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम् । सञ्जग्मानो दिवा पृथिव्या शुक्रः शुक्रशोचिषा निरस्तः शण्डः शुक्रस्याधिष्ठानमसि ॥

सुवीर इति सुऽवीरः। वीरान्। प्रजनयन्निति प्रऽजनयन्। परि। इहि। अभि। रायः। पोषेण। यजमानम्। सञ्जग्मान इति सम्ऽजग्मानः। दिवा। पृथिव्या। शुक्रः। शुक्रशोचिषेति शुक्रऽशोचिषा। निरस्त इति निःऽअस्तः। शण्डः। शुक्रस्य। अधिष्ठानम्। अधिस्थानमित्यधिऽस्थानम्। असि॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की भावना के अनुसार अपने में वीरता का पूरण करनेवाला ( सुवीरः ) =  उत्तम वीर ( वीरान् ) = [ virtues, उत्कृष्टगुणान्—द० ] उत्तम गुणों को ( प्रजनयन् ) = अपने में विकसित करता हुआ तू ( परीहि ) = सर्वतः प्राप्त हो। 

२. ( रायस्पोषेण ) = धन के पोषण से तू ( यजमानम् ) = यज्ञ करनेवाले को, अर्थात् दानादि उत्तम कार्यों के करनेवाले को ( अभि ) = लक्ष्य करके ( परीहि ) = प्राप्त हो, अर्थात् तू धन-धान्य से समृद्ध होकर यज्ञादि उत्तम कर्मों को करनेवाला बन। 

३. ( दिवा ) = देदीप्यमान मस्तिष्क से तथा ( पृथिव्या ) = [ प्रथ विस्तारे ] विस्तृत शक्तियोंवाले शरीर से ( संजग्मानः ) = सङ्गत हो, अर्थात् तेरा मस्तिष्क ज्ञानज्योति से चमके तो तेरा शरीर सब शक्तियों के विस्तारवाला होता हुआ सचमुच ‘पृथिवी’ हो। 

४. ( शुक्रः ) = तू वीर्य का पुञ्ज बन। ( शुक्रशोचिषा ) = पवित्र करनेवाले वीर्य की दीप्ति से तू ( निरस्तः ) = अपमृष्टः = सब मलिनताओं को दूर करके पूर्ण शुद्ध बन। 

४. पूर्ण शुद्ध बना हुआ यह ( शण्डः ) = शमादि गुणयुक्त पुरुष ( शुक्रस्य ) = इस जीवन को पवित्र करनेवाले सोम का ( अधिष्ठानम् ) = आधार ( असि ) = है। शमादि गुण वीर्यरक्षा में सहायक होते हैं। इसी से शान्त पुरुष वीर्य का अधिष्ठान बनता है। वीर्य शमादि गुणों का जनक है तो शमादि गुण वीर्यरक्षा में सहायक हैं। इसी दृष्टिकोण से ब्रह्मचारी के लिए सौम्य होना आवश्यक है और क्रोध वर्जित है।
Essence
भावार्थ — १. वीर्यरक्षा से वीर बनकर मनुष्य अपने में सद्गुणों का पोषण करता है। २. धन की वृद्धि करके यज्ञशील बनता है। ३. देदीप्यमान मस्तिष्क व विस्तृत शक्तिवाले शरीर को प्राप्त करता है। ४. सब मालिन्यों से दूर होता है और ५. शमादि गुणों से युक्त होता है।
Subject
शमादि गुणयुक्त पुरुष